बकरियों के स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ महिलाओं को मिल रहा है स्थानीय स्तर पर रोजगार




• पशु सखी: ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और बकरी पालन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका।

• बकरियों के स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ महिलाओं को मिल रहा है स्थानीय स्तर पर रोजगार।

पटना : बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका) के अंतर्गत पशु सखी ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन को आजीविका के एक सशक्त माध्यम के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। पशु सखी जीविका संपोषित स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी प्रशिक्षित सामुदायिक कैडर हैं, जो विशेष रूप से बकरी पालक महिलाओं को उनके पशुओं, खासतौर पर बकरियों, की उचित देखभाल, स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा एवं वैज्ञानिक पशुपालन संबंधी जानकारी और मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
पशु सखियाँ बकरियों में होने वाली प्रमुख बीमारियों की रोकथाम, समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं के उपयोग, संतुलित आहार, स्वच्छता एवं उनके प्राथमिक उपचार के संबंध में पशुपालकों को जागरूक करती हैं। उनके नियमित सहयोग से ग्रामीण क्षेत्र में बकरियों में बीमारी एवं मृत्यु दर को कम करने, पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने तथा बकरी पालन से होने वाली आय में वृद्धि करने में मदद मिल रही है।

जीविका की यह पहल ग्रामीण महिलाओं को पशुपालन के क्षेत्र में आवश्यक तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने के साथ-साथ यह मॉडल जीविका से जुड़ी महिलाओं को पशु सेवा प्रदाता के रूप में विकसित कर रहा है तथा उन्हें स्वरोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है। आधारित मॉडल पशु सखियों के माध्यम से गांव स्तर पर पशुपालन सेवाओं की उपलब्धता बेहतर हो रही है तथा बकरी पालन ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। वर्तमान समय में कुल 8700 जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं पशु सखी के रूप में कार्य रही हैं।

इस प्रकार लखीसराय जिला अंतर्गत चानन प्रखंड के ईंटोन पंचायत स्थित मननपुर गांव की श्रीमती खुशबू कुमारी भी एक सफल पशु सखी के रूप में कार्य कर रही हैं। इंटर पास खुशबू कुमारी वर्ष 2019 से ही मासूम जीविका महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हुई हैं। खुशबू के पति श्री सुजीत चौधरी खेती कार्य से जुड़े हुए हैं। खेती में लागत के लिए पैसे की जरूरत थी, इसलिए खुशबू ने अपने समूह से 1 लाख रुपये का ऋण लिया और फसल उत्पादन में लगाया। मेहनत और जीविका से मिले कृषि मार्गदर्शन से उन्हें खेती कार्य से प्रति वर्ष 40 से 50 हजार रुपये का मुनाफा होने लगा है। जीविका से मिले ऋण ने उन्हें स्वावलंबन की राह दिखाई।

समूह में खुशबू की सक्रियता और पशुओं के प्रति लगाव को देखते हुए नारी कल्याण जीविका स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड, जीविका ने उन्हें वर्ष 2023 में पशु सखी के रूप में चयनित किया। यह जिम्मेदारी बकरी पालकों के लिए जीवनदायिनी साबित हुई है। इस कार्य के लिए उन्हें जीविका द्वारा वर्ष 2023 और 2025 में पांच-पांच दिन का गहन प्रशिक्षण भी दिया गया है। प्रशिक्षण में उन्हें बकरियों की प्रमुख बीमारियों, टीकाकरण, कृमि नाशक दवा, विटामिन, प्राथमिक उपचार और संतुलित आहार के बारे में जानकारी दी गई l

पशु सखी के रूप वह प्रतिदिन पशु पलकों के जरूरत के आधार पर उनकी बकरियों की घर-घर जाकर निगरानी करती हैं तथा डीवार्मिंग- हर तीन महीने पर बकरियों को कृमि की दवा देना; वैक्सीनेशन- समय पर पीपीआर, ईटी जैसी घातक बीमारियों का टीका लगाना; विटामिन और दवा- कमजोर बकरियों को विटामिन और जरूरत के अनुसार दवा उपलब्ध कराना; सलाह और देखभाल- बकरी पालकों को साफ-सफाई, बरसात में रख-रखाव और चारा प्रबंधन आदि पर सलाह देती हैं तथा वह अपनी सेवा के अनुरूप बकरीपालकों से शुल्क लेती हैं।

खुशबू जैसी पशु सखियों के आने के बाद बकरियों के मृत्यु दर में भारी कमी आई है तथा बकरीपालन सिर्फ रोज़ी-रोटी कमाने के साधन से आगे बढ़ते हुए एक उद्यम महत्वपूर्ण जरिया बनकर उभरा है।

खुशबू द्वारा दिए जा रहे मार्गदर्शन, सहयोग एवं सलाह से बकरी पालकों की आमदनी सीधे तौर पर बढ़ी है। बकरियां स्वस्थ रहती हैं, उनका वजन बढ़ता है और बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। मननपुर की कई दीदियां कहती हैं कि खुशबू हमारी बकरियों की डॉक्टर दीदी हैं। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उन्हें जीविका द्वारा निर्धारित मानदेय प्रतिमाह मिलता है, जिससे वह अपने परिवार को अतिरिक्त आर्थिक सहारा तो देती हीं हैं साथ में वह स्वयं से भी आर्थिक एवं सामाजिक रूप से स्वावलंबी हुई हैं l एक तरफ उन्होंने समूह से ऋण लेकर खेती से मुनाफा कमाकर खुद को आत्मनिर्भर बनाया, तो दूसरी तरफ पशु सखी बनकर गांव की लक्षित 120 से अधिक बकरी पालक महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं।

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