ख़ास रिपोर्ट | दुबई, यूएई
सैयद आसिफ़ इमाम काकवी |
दुबई, 18 अक्टूबर 2026। दुबई की सरज़मीन पर यह शाम सिर्फ़ एक कार्यक्रम की शाम नहीं थी, बल्कि अलीगढ़ की यादों, सर सैयद अहमद ख़ाँ के तालीमी मिशन, अदब की ख़ुशबू और आपसी मोहब्बत के नाम एक यादगार शाम थी। एतिसालात एकेडमी, मुहैसना-2 में आयोजित सर सैयद डे कॉन्फ़्रेंस 2026 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से वाबस्ता लोगों, अलीग बिरादरी और मुख़्तलिफ़ शोबों की शख़्सियात ने शिरकत की। दुबई की फ़िज़ाओं में अलीगढ़ की तहज़ीब की रौनक़, अपने लोगों से मिलने की ख़ुशी और तालीम के ज़रिए बेहतर मुस्तक़बिल बनाने का जज़्बा साफ़ महसूस हुआ। यह आयोजन याद दिलाता रहा कि वतन से हज़ारों मील दूर रहकर भी अपनी तालीमी और तहज़ीबी जड़ों से रिश्ता कभी कमज़ोर नहीं पड़ता।
इस कॉन्फ़्रेंस में मशहूर शिक्षक ख़ान सर, शाहीन ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूशंस के संस्थापक एवं चेयरमैन डॉ. अब्दुल क़दीर और सिविल सेवा मार्गदर्शक एवं शिक्षक अवध ओझा सर जैसी शख़्सियात की मौजूदगी ने कार्यक्रम को ख़ास पहचान दी। अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े इन लोगों के तजुर्बात ने तालीम, करियर, कारोबार, सेहत, नौजवानों के भविष्य और समाजी तरक़्क़ी जैसे विषयों पर बातचीत के लिए एक अहम मंच तैयार किया। कार्यक्रम में इफ़्तेख़ार अहमद की शिरकत भी उल्लेखनीय रही, जिन्हें आयोजकों के परिचय के अनुसार वीआईपी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ से जुड़ी राजनीतिक भूमिका में जाना जाता है। ऐसी बैठकों की अहमियत इसी में है कि मुख़्तलिफ़ तजुर्बों के लोग एक-दूसरे की बात सुनें और समाज की बेहतरी के लिए नए रास्ते तलाश करें।
इस यादगार शाम में पूर्व बिहार राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के पुत्र कबीर आरिफ़ की मौजूदगी और अन्य विशिष्ट लोगों से मुलाक़ातों ने भी आपसी संवाद को यादगार बनाया। मणिशंकर अय्यर जी और प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद झा जी से बातचीत का मौक़ा भी ख़ास रहा। ऐसे मौक़े सिर्फ़ मुलाक़ातों और तस्वीरों तक सीमित नहीं होते, बल्कि नए विचारों, अनुभवों और आपसी एहतराम के रिश्तों को मज़बूत करने का ज़रिया बनते हैं।
कार्यक्रम का एक दिलचस्प पहलू “Aligarh & Elegance of Arts” के उनवान से अलीगढ़ की अदबी और तहज़ीबी विरासत पर अपने ख़यालात पेश करना भी रहा। अलीगढ़ महज़ एक यूनिवर्सिटी का नाम नहीं, बल्कि एक फ़िक्र, एक तालीमी तहरीक और इल्म-ओ-अदब से मोहब्बत करने वालों की साझा पहचान है। शाइस्तगी, इल्मी बहस, ज़बान की मिठास और इंसानी रिश्तों का एहतराम इसकी तहज़ीब के अहम पहलू हैं।
शायर अकबर इलाहाबादी के अशआर भी इस जज़्बे की याद दिलाते हैं:
“जो लोग तरफ़दार अलीगढ़ के रहेंगे,
इस दौर में बेशक वही बढ़-चढ़ के रहेंगे।”
दुबई की सरज़मीन पर सजी सर सैयद डे कॉन्फ़्रेंस 2026 की शाम सिर्फ़ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अलीगढ़ की यादों, सर सैयद अहमद ख़ाँ के तालीमी मिशन, अदब की ख़ुशबू और आपसी मोहब्बत का एक ख़ूबसूरत जश्न थी। इस यादगार कार्यक्रम में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से वाबस्ता लोगों, अलीग बिरादरी, शिक्षाविदों और मुख़्तलिफ़ क्षेत्रों की शख़्सियात ने शिरकत की। दुबई की फ़िज़ाओं में अलीगढ़ की तहज़ीब की रौनक़, पुराने दोस्तों से मिलने की ख़ुशी और आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तक़बिल की उम्मीद साफ़ महसूस हुई। यह शाम याद दिला गई कि अलीगढ़ से रिश्ता महज़ किसी विश्वविद्यालय में पढ़ने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह ज़िंदगी भर दिल में बसने वाली एक तहज़ीबी और इल्मी पहचान है।
इस शानदार कार्यक्रम की कामयाबी का ज़िक्र हो और हमारे अज़ीज़ अंजुम फ़ुरक़ान भाई की मेहनत, ख़ुलूस और मोहब्बत का ज़िक्र न हो, तो रिपोर्ट अधूरी रह जाएगी। अंजुम फ़ुरक़ान उन लोगों में हैं जो सर सैयद डे को केवल एक सालाना आयोजन नहीं, बल्कि अलीगढ़ की तालीमी और तहज़ीबी विरासत से अपने रिश्ते को मज़बूत करने का एक अहम ज़रिया समझते हैं। उनकी दिली ख़्वाहिश और कोशिशों के साथ अलीगढ़ के पुराने छात्रों की मेहनत इस आयोजन को ख़ास पहचान देती है। इरफ़ान भाई और इमरान भाई समेत उन तमाम पुराने अलीग साथियों की मेहनत भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है, जो इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए पूरे ख़ुलूस के साथ जुटे रहते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इन पूर्व छात्रों के लिए सर सैयद डे केवल एक तारीख़ नहीं, बल्कि अपने उस्तादों, अपने इदारे, अपनी यादों और अपनी तहज़ीब से दोबारा जुड़ने का मौक़ा है।
दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय शहर में रहते हुए भी अपनी शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान को ज़िंदा रखना अपने आप में एक अहम कोशिश है। मेरे लिए यह कार्यक्रम व्यक्तिगत तौर पर भी ख़ास अहमियत रखता है। अंजुम फ़ुरक़ान भाई हर साल बड़ी मोहब्बत और ख़ुलूस के साथ मुझे इस कार्यक्रम में शामिल होने की दावत देते रहे हैं। उनकी यह मोहब्बत मेरे लिए हमेशा क़ाबिल-ए-क़द्र रही है। पिछले वर्षों में मुझे भी इस महफ़िल में शामिल होने और अपने अलीग दोस्तों के साथ कुछ यादगार लम्हे गुज़ारने का मौक़ा मिलता रहा है। लेकिन इस बार भारत में मौजूद होने के कारण मैं दुबई की इस शानदार शाम में शरीक नहीं हो सका। दिल में एक कसक ज़रूर रही कि अपने दोस्तों के बीच बैठकर इस महफ़िल का हिस्सा नहीं बन पाया, मगर अपने अज़ीज़ों की शिरकत और कार्यक्रम की कामयाबी की ख़बर से दिल को ख़ुशी मिली।कभी-कभी इंसान किसी महफ़िल में मौजूद नहीं होता, लेकिन उसकी यादें, मोहब्बत और रिश्ते उसके साथ होते हैं।
मेरे लिए भी यह आयोजन कुछ ऐसा ही रहा। मेरे कई दोस्त इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इस कॉन्फ़्रेंस में मशहूर शिक्षक ख़ान सर, शाहीन ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूशंस के संस्थापक एवं चेयरमैन डॉ. अब्दुल क़दीर और सिविल सेवा परीक्षाओं के मार्गदर्शक अवध ओझा सर जैसी शख़्सियतों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की अहमियत बढ़ाई। शिक्षा, करियर, कारोबार, स्वास्थ्य, संस्कृति और नौजवानों के भविष्य जैसे विषयों पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए यह एक महत्वपूर्ण मंच बना। इफ़्तेख़ार अहमद समेत अन्य विशिष्ट अतिथियों की भागीदारी भी आयोजन का हिस्सा रही। पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर और प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद झा से मुलाक़ात और बातचीत के अवसर ने इस शाम को और यादगार बनाया। सर सैयद अहमद ख़ाँ ने जिस समाज का सपना देखा था, उसकी बुनियाद शिक्षा और जागरूकता पर रखी थी। आज उनके मिशन को आगे बढ़ाने का तक़ाज़ा है कि हम अपने बच्चों की शिक्षा, युवाओं के मार्गदर्शन, शोध और वैज्ञानिक सोच को प्राथमिकता दें तथा समाज के वंचित वर्गों तक भी ज्ञान की रोशनी पहुँचाएँ।अलीगढ़ से मोहब्बत का असल मतलब केवल उसके नाम पर फ़ख़्र करना नहीं, बल्कि उसकी अच्छी रवायतों को अपनी ज़िंदगी में उतारना और समाज की बेहतरी के लिए काम करना है।
जब अलीगढ़ के पुराने छात्र दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एकत्र होकर शिक्षा, संस्कृति और भाईचारे की बात करते हैं, तो यह उस तालीमी विरासत की जीवंत मिसाल बन जाता है। दुबई की इस शाम की कामयाबी पर अंजुम फ़ुरक़ान भाई, और आयोजन से जुड़े तमाम अलीग साथियों को दिल से मुबारकबाद। उम्मीद है कि यह सिलसिला आने वाले वर्षों में और मज़बूत होगा, नई पीढ़ी इससे जुड़ेगी और सर सैयद अहमद ख़ाँ का तालीमी मिशन नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगा। अलीगढ़ की तहज़ीब को सलाम, सर सैयद के ख़्वाब को सलाम और उन तमाम दोस्तों को सलाम, जो अपनी मेहनत, मोहब्बत और ख़ुलूस से इल्म, अदब और भाईचारे की शमा रौशन रखे हुए हैं।
— सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
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