लेखक: सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
न्यूज डेस्क: काफ़ी दिनों से सोच रहा था कि इस विषय पर क़लम चलाऊँ। कई लोगों ने फ़ोन करके पूछा कि काकवी साहब, आप सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर लिखते हैं, फिर असदुद्दीन ओवैसी साहब की सियासत पर आपकी क़लम ख़ामोश क्यों है? आज रामपुर में उनकी तक़रीर के बाद दिल में उठ रहे सवालों को अल्फ़ाज़ देने का फ़ैसला किया। ओवैसी साहब कह रहे हैं कि वे दलाल नहीं, बल्कि मुसलमानों को सियासत में हिस्सेदारी दिलाने आए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमानों के नौजवानों और महिलाओं को अपनी क़यादत में आगे बढ़ने का मौक़ा मिलना चाहिए और उन्हें किसी दूसरे परिवार की सियासत के पीछे खड़े रहने के बजाय ख़ुद नेतृत्व करना चाहिए।
पहली नज़र में यह बात अपनी जगह अहम है, क्योंकि लोकतंत्र में हर समाज को अपनी आवाज़ उठाने और अपने नेतृत्व को आगे बढ़ाने का हक़ है। लेकिन मेरा सवाल है कि अगर हिस्सेदारी का दावा है, तो उसके नतीजों का हिसाब भी होना चाहिए। आख़िर यह हिस्सेदारी किसकी ज़िंदगी बदल रही है? कितने ग़रीब बच्चों को बेहतर तालीम मिली? कितने नौजवानों को रोज़गार के अवसर मिले? कितने पसमांदा मुसलमानों को निर्णय लेने वाली जगहों पर बैठाया गया? कितनी महिलाओं को सिर्फ़ मंच पर जगह नहीं, बल्कि संगठन और सियासत में वास्तविक अधिकार मिले? और कितने आम लोगों को ऐसा नेतृत्व मिला, जिसके दरवाज़े चुनाव के बाद भी उनके लिए खुले रहते हैं? ये सवाल किसी की निजी ज़िंदगी पर हमला नहीं, बल्कि उस राजनीतिक दावे का जायज़ा हैं जो मुसलमानों के नाम पर किया जाता है। भारत की सियासत में मुसलमानों की भागीदारी का इतिहास छोटा नहीं है।
आज़ादी के बाद मुस्लिम सांसदों, राज्यसभा सदस्यों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और विधायकों ने देश की राजनीति में अपनी भूमिका निभाई है। देश को डॉ. ज़ाकिर हुसैन, फ़ख़रुद्दीन अली अहमद और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे तीन मुस्लिम राष्ट्रपति भी मिले। अलग-अलग ऐतिहासिक संकलनों में मुस्लिम प्रतिनिधियों की बड़ी तादाद का ज़िक्र किया जाता है, लेकिन 1952 से 2024 तक 541 लोकसभा सांसद, 329 राज्यसभा सांसद, 43 कैबिनेट मंत्री और 18 मुख्यमंत्री जैसे आँकड़ों को किसी एक समान और प्रमाणित सूची के बिना अंतिम तथ्य मानना ठीक नहीं होगा। फिर भी बुनियादी सवाल अपनी जगह मौजूद है इतने लंबे राजनीतिक सफ़र के बाद भी आम मुस्लिम परिवारों की तालीम, रोज़गार, आर्थिक हालत और सामाजिक सुरक्षा में अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं दिखाई देता? इसका जवाब सिर्फ़ एक नेता या एक पार्टी से नहीं माँगा जा सकता।
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और तमाम क्षेत्रीय दलों को भी अपने काम का हिसाब देना चाहिए। मुसलमानों के वोट लेने वाली हर पार्टी से यह पूछना ज़रूरी है कि उसने अपने वादों को कितना पूरा किया। लेकिन जब कोई नेता ख़ुद को मुसलमानों की अलग और मज़बूत क़यादत का विकल्प बताता है, तो उससे जवाबदेही की उम्मीद भी उतनी ही बढ़ जाती है। ओवैसी साहब, आप दूसरों की सियासत पर सवाल उठाते हैं, वंशवाद का विरोध करते हैं और कहते हैं कि मुस्लिम नौजवानों को आगे आने का मौक़ा मिलना चाहिए। बिल्कुल मिलना चाहिए। लेकिन क्या यह सिद्धांत आपकी अपनी पार्टी के भीतर भी पूरी मज़बूती से लागू होता दिखाई देता है? क्या आम कार्यकर्ता भी नेतृत्व के शीर्ष तक पहुँच सकता है? क्या पसमांदा समाज, ग़रीब तबक़े और महिलाओं को संगठन के अहम फ़ैसलों में वास्तविक अधिकार मिलते हैं? क्या पार्टी के भीतर असहमति रखने वाले व्यक्ति को भी सम्मान के साथ सुना जाता है? किसी भी नेता की असली ताक़त केवल उसके भाषणों में नहीं, बल्कि इस बात में होती है कि वह अपने बाद कितने सक्षम और स्वतंत्र नेतृत्व तैयार करता है।
अब हैदराबाद की बात करते हैं, जिसे AIMIM का सबसे मज़बूत सियासी गढ़ माना जाता है। 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में AIMIM ने नौ सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सात सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी ने पुराने हैदराबाद में अपनी मज़बूत पकड़ बरकरार रखी। यह एक वास्तविक चुनावी उपलब्धि है, जिसे नकारना सही नहीं होगा। लेकिन इसी उपलब्धि के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है: क्या किसी एक क्षेत्र में सात सीटें जीत लेना व्यापक मुस्लिम क़यादत का पर्याप्त पैमाना है? क्या पार्टी अपनी राजनीतिक मौजूदगी को हैदराबाद से बाहर भी ऐसे जनाधार में बदल पाई है, जहाँ वह अलग-अलग सामाजिक वर्गों के लोगों को साथ लेकर ठोस नतीजे दे सके? आठवीं सीट जीतने की चुनौती को केवल संख्या का सवाल नहीं समझना चाहिए; असली चुनौती है अपने सीमित गढ़ से आगे बढ़कर भरोसे, विकास और जनसेवा का व्यापक मॉडल प्रस्तुत करना। अगर पार्टी ख़ुद को राष्ट्रीय विकल्प कहती है, तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर संगठन, नेतृत्व, सामाजिक प्रतिनिधित्व और ज़मीनी काम के आधार पर भी अपनी ताक़त साबित करनी होगी।
बिहार का अनुभव भी राजनीतिक आत्ममंथन की माँग करता है। 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने पाँच सीटें जीती थीं, लेकिन 2022 में उसके पाँच में से चार विधायक राष्ट्रीय जनता दल में चले गए। यह घटना पार्टी के संगठन और अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को साथ बनाए रखने की क्षमता पर सवाल उठाती है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में AIMIM ने फिर पाँच सीटें हासिल कीं। इससे सीमांचल में उसके जनाधार का पता चलता है, लेकिन यह भी ज़रूरी है कि पार्टी अपने विधायकों की जवाबदेही, जनता से संपर्क और विकास के कामों का नियमित हिसाब सामने रखे। चुनाव जीतना एक उपलब्धि है; उस जीत को जनता की ज़िंदगी में बदलाव में बदलना उससे बड़ी ज़िम्मेदारी है। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी साहब की सक्रियता और रामपुर की तक़रीर ने इस बहस को फिर तेज़ कर दिया है। अगर मुसलमानों को अपनी अलग क़यादत खड़ी करनी है, तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन क्या अलग चुनाव लड़ना ही राजनीतिक आत्मनिर्भरता का एकमात्र रास्ता है? क्या साझा मुद्दों पर विपक्षी दलों से बातचीत, सम्मानजनक गठबंधन और चुनावी परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बनाना कमज़ोरी है? हर सीट पर चुनाव लड़ना किसी भी पार्टी का अधिकार है, मगर मतदाताओं को यह जानने का अधिकार भी है कि उस फ़ैसले का संभावित असर क्या होगा।
किसी पार्टी पर बिना ठोस सबूत यह आरोप लगाना उचित नहीं कि वह जानबूझकर किसी दूसरे दल को फ़ायदा पहुँचाती है। लेकिन वोटों के बँटवारे, उम्मीदवारों के चयन और चुनावी नतीजों का निष्पक्ष विश्लेषण करना भी ज़रूरी है। सियासत में नीयत के दावे अपनी जगह हैं, मगर जनता को परिणाम भी देखने चाहिए। मेरे मुस्लिम भाइयों और बहनों से भी गुज़ारिश है कि किसी नेता को मसीहा न बनाइए। न ओवैसी साहब को सवालों से ऊपर रखिए, न किसी दूसरी पार्टी के नेता को। जो आपके वोट माँगता है, उससे पूछिए कि उसने आपके बच्चों के स्कूल, अस्पताल, रोज़गार, सुरक्षा और कानूनी मदद के लिए क्या किया। हमें ऐसी राजनीतिक सोच चाहिए जिसमें नौजवान केवल रैलियों की भीड़ न हों, बल्कि नीति बनाने वाले हों; महिलाएँ केवल समर्थक न हों, बल्कि नेतृत्वकर्ता हों; पसमांदा मुसलमान केवल चुनावी भाषणों का हिस्सा न हों, बल्कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी जगह पाएँ। सियासी हिस्सेदारी का मतलब केवल विधानसभा या संसद की सीट नहीं, बल्कि बजट, नीति, शिक्षा, रोज़गार और स्थानीय विकास से जुड़े फ़ैसलों में प्रभावी भागीदारी भी है। ओवैसी साहब, आपकी आवाज़ संसद में गूँजती है, आपकी तक़रीरें चर्चा में रहती हैं और आप अपने समर्थकों में राजनीतिक चेतना पैदा करने का दावा करते हैं। अब वक़्त है कि इस आवाज़ के साथ एक स्पष्ट और मापने योग्य कार्यक्रम भी सामने आए शिक्षा के लिए क्या योजना है, बेरोज़गार युवाओं के लिए क्या सहायता होगी, ग़रीबों को कानूनी मदद कैसे मिलेगी, महिलाओं और पसमांदा तबक़े को कितने नेतृत्व के अवसर मिलेंगे और पार्टी हर साल अपने काम का हिसाब जनता के सामने कैसे रखेगी? यह सवाल केवल AIMIM से नहीं, बल्कि मुसलमानों के वोट और समर्थन पर राजनीति करने वाली हर पार्टी से पूछा जाना चाहिए।
मेरी बात का मक़सद किसी की नीयत पर फ़ैसला सुनाना नहीं है। मक़सद यह याद दिलाना है कि क़ौम का मुस्तक़बिल किसी एक नेता, एक पार्टी या एक तक़रीर के हवाले नहीं किया जा सकता। हमें अपने नेताओं से मोहब्बत हो सकती है, मगर सवाल पूछने का हक़ भी बचा रहना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में वफ़ादारी का मतलब ख़ामोशी नहीं और आलोचना का मतलब दुश्मनी नहीं होता। ओवैसी साहब, मुसलमानों को यह बताना काफ़ी नहीं कि उनकी क़यादत कौन करेगा; यह भी बताइए कि उनकी ज़िंदगी कैसे बदलेगी। हिस्सेदारी का नारा तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ तालीम, रोज़गार, आर्थिक मज़बूती, इंसाफ़ और व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व के ठोस नतीजे दिखाई देंगे। क़ौम को तालियों की गूँज से आगे बढ़कर अपने बच्चों के बेहतर मुस्तक़बिल की फ़िक्र करनी होगी। हमें ऐसी क़यादत चाहिए जो सवालों से न डरे, जवाबदेही से न भागे और अपने समर्थकों को केवल वोटर नहीं, बल्कि बराबर का भागीदार समझे। आख़िर में सवाल वही है हिस्सेदारी का दावा कितना बड़ा है, और उस दावे से आम मुसलमान की ज़िंदगी में बदलाव कितना आया है? इसका जवाब नारों से नहीं, काम और नतीजों से मिलना चाहिए। यही सच्ची ख़िदमत है, यही लोकतंत्र की रूह है और यही आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।


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