जब बापू मेरे आबाई घर ज़ुल्फ़ीपुर पहुँचे थे…


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सैय्यद आसिफ इमाम काकवी : 

न्यूज डेस्क: आज 2 अक्टूबर है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती। इस मौक़े पर मैं बापू को दिल की गहराइयों से ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करता हूँ और उन तमाम महान विभूतियों को सलाम करता हूँ, जिन्होंने इंसानियत, अमन और इंसाफ़ के लिए अपनी ज़िंदगी वक़्फ़ कर दी। महात्मा गांधी ने अपनी पूरी ज़िंदगी सत्य, अहिंसा, इंसानियत और भाईचारे के लिए समर्पित कर दी। उनके लिए आज़ादी सिर्फ़ अंग्रेज़ों की हुकूमत से निजात का नाम नहीं थी, बल्कि ऐसी आज़ादी थी जिसमें आख़िरी पायदान पर खड़े इंसान को भी सम्मान, सुरक्षा और इंसाफ़ मिल सके। लेकिन आज गांधी जयंती के इस मौक़े पर मैं गांधीजी की ज़िंदगी से जुड़ी एक ऐसी ऐतिहासिक याद आपके सामने रख रहा हूँ, जो मेरे लिए केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। यह मेरे ख़ानदान की विरासत है। यह मेरे पुरखों के दर्द की कहानी है। और यह उस मिट्टी की कहानी है, जहाँ एक दिन बापू ख़ुद पहुँचे थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि वर्ष 1947 के दौर में महात्मा गांधी ने जहानाबाद और उसके आसपास के इलाक़ों का दौरा किया था। यह वह समय था जब मुल्क आज़ादी की दहलीज़ पर खड़ा था, मगर दूसरी तरफ़ सांप्रदायिक तनाव, हिंसा और दंगों ने आम इंसान की ज़िंदगी को बुरी तरह झकझोर दिया था। गांधीजी उन लोगों के बीच पहुँचे जिनके घर उजड़ चुके थे, जिनके दिल ज़ख़्मी थे और जिनकी आँखों में अपने खोए हुए अपनों की तस्वीरें थीं। वह लोगों की बातें सुनते थे। उनके आँसू देखते थे। उनके ज़ख़्मों को महसूस करते थे और फिर यही कहते थे कि नफ़रत किसी समस्या का हल नहीं हो सकती। इसी सिलसिले में काको, अमथुआ, बेलई, घोसी, अब्दालचक, अब्दालपुर, ओकरी और ज़ुल्फ़ीपुर जैसे इलाक़ों का भी ज़िक्र मिलता है।


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ज़ुल्फ़ीपुर—आज का मोदनगंज मेरे पुरखों का आबाई गाँव है, और यही वह जगह है, जहाँ बापू मेरे ख़ानदान के उस दर्द से रूबरू हुए थे, जिसकी टीस पीढ़ियों के गुज़र जाने के बाद भी हमारे दिलों में ज़िंदा है। कभी मेरे पुरखों का घर आबाद था। आँगन में ज़िंदगी थी। घर में रिश्तों की रौनक थी। बच्चों की आवाज़ें थीं। बुज़ुर्गों की दुआएँ थीं। मगर फिर वह दौर आया, जब दंगों की आग ने इंसानी रिश्तों और बस्तियों को झुलसा दिया। परिवार को अपना आबाई घर छोड़ना पड़ा।

उस दौर की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि परिवार की औरतों ने अपने बच्चों को बचाने और भीड़ से अपनी हिफ़ाज़त करने की कोशिश में घर के पास मौजूद कुएँ में छलांग लगा दी। आज जब मैं उस कुएँ के बारे में सोचता हूँ तो दिल काँप उठता है। उस कुएँ की ख़ामोशी में न जाने कितनी चीख़ें दफ़्न थीं।


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न जाने कितनी माओं की मजबूरी थी। न जाने कितने बच्चों की मासूमियत थी। और न जाने कितने सपनों का वहीं अंत हो गया। गांधीजी के सामने मेरे दादा ने सुनाई थी दर्द की दास्तान दंगों के बाद जब गांधीजी ज़ुल्फ़ीपुर पहुँचे और उन्होंने उस इलाक़े की तबाही को अपनी आँखों से देखा, तब मेरे दादा मरहूम सैयद मंज़ूर सुब्हानी ने उनसे मुलाक़ात की। मेरे दादा ने बापू को अपने ख़ानदान पर गुज़री पूरी दास्तान सुनाई।उन्होंने वह वीरान मकान दिखाया। वह कुआँ दिखाया और बताया कि किस तरह एक आबाद ख़ानदान दंगों की त्रासदी में अपनी जड़ों से उखड़ गया।


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मेरे दादा की आँखों में उस वक़्त का दर्द था और सामने गांधीजी थे एक ऐसा इंसान जो देशभर के ज़ख़्मों को अपने सीने में महसूस कर रहा था। दादा के अल्फ़ाज़ आज भी हमारे ख़ानदान की यादों में ज़िंदा हैं बापू, आपने मेरे ज़ख़्म को मानो फिर कुरेद दिया है। अक्टूबर 1946 की वह मनहूस रात और दिन, मेरे ख़ानदान के साथ जो कुछ हुआ, वह ज़ख़्म मेरी ज़िंदगी की आख़िरी साँस तक मेरे साथ रहेगा। इससे ज़्यादा न मैं लिख पाऊँगा, न आप पढ़ पाएँगे।”
ये महज़ अल्फ़ाज़ नहीं थे।


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यह एक ऐसे इंसान के दिल की आवाज़ थी, जिसने अपनी आँखों के सामने अपना घर उजड़ते देखा था। दंगों के बाद परिवार के जो लोग वहाँ से निकल सके, वे काको आकर बस गए। काको धीरे-धीरे नया आशियाना बना, लेकिन ज़ुल्फ़ीपुर दिल से कभी नहीं निकला। घर पीछे छूट गया, मगर घर की याद नहीं छूटी।

वह मिट्टी, वह आँगन, वह वीरान मकान और वह कुआँ—सब हमारी पारिवारिक स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज भी हमारे पास उस पैतृक घर की तस्वीरें मौजूद हैं। उन्हीं तस्वीरों में गांधीजी उस वीरान मकान का जायज़ा लेते हुए दिखाई देते हैं।


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मेरे लिए वह तस्वीर महज़ एक तस्वीर नहीं है। वह मेरे ख़ानदान की तारीख़ है। वह मेरे पुरखों की गवाही है। वह एक दौर की इंसानी त्रासदी का दस्तावेज़ है।आज मेरे दादा मरहूम सैयद मंज़ूर सुब्हानी इस दुनिया में नहीं हैं।लेकिन कुछ लोग दुनिया से चले जाने के बाद भी दिलों से कभी नहीं जाते। दादा की याद आती है तो उनकी मीठी आवाज़, उनका प्यार, उनकी मोहब्बत और मेरी छोटी-छोटी ख़्वाहिशों को पूरा करने का उनका अंदाज़ आँखों के सामने आ जाता है। वह सिर्फ़ मेरे दादा नहीं थे। वह मेरे पथप्रदर्शक थे। मेरे मार्गदर्शक थे। मेरे लिए मोहब्बत, इंसानियत और सामाजिक ज़िम्मेदारी की एक मिसाल थे। वह मिल्लतपरस्त, मिलनसार और इंसानियत के पैरोकार थे। उन्होंने इंसान को धर्म, जाति, उम्र या हैसियत के तराज़ू पर नहीं तौला। गरीबों और मज़लूमों के हमदर्द रहे। हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे को मज़बूत करने की कोशिश करते रहे। शायद यही वजह है कि उनकी याद आज भी मेरे दिल में इतनी गहरी है। आज गांधी जयंती पर जब मैं बापू को याद करता हूँ, तो मेरे दादा भी मेरी आँखों के सामने आ जाते हैं। एक ने पूरे मुल्क को अमन, सत्य और अहिंसा का रास्ता दिखाया। दूसरे ने अपनी ज़िंदगी में इंसानियत को जिया। दोनों की राह हमें यही सिखाती है कि नफ़रत इंसान को तोड़ती है, जबकि मोहब्बत जोड़ती है।

आज ज़रूरत है कि हम इतिहास के इन ज़ख़्मों को नफ़रत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों को सबक देने के लिए याद करें। क्योंकि इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि जब इंसान इंसान के ख़िलाफ़ खड़ा होता है तो सबसे पहले इंसानियत हारती है। आइए, इस गांधी जयंती पर हम संकल्प लें नफ़रत मिटाएँ, देश बचाएँ। मज़लूम की आवाज़ बनें। ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े हों।





सच का साथ दें। और इंसानियत को सबसे ऊपर रखें। गांधीजी को सच्चा ख़िराज-ए-अक़ीदत सिर्फ़ फूल चढ़ाना नहीं है। सच्ची श्रद्धांजलि यह है कि हम उनके बताए सत्य, अहिंसा, अमन और इंसानियत के रास्ते को अपनी ज़िंदगी में जगह दें। आज 2 अक्टूबर को बापू को मेरा सलाम। और मेरे प्यारे दादा मरहूम सैयद मंज़ूर सुब्हानी को भी दिल की गहराइयों से याद। अल्लाह तआला उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए। ज़ुल्फ़ीपुर की वह मिट्टी आज भी हमारे पुरखों की कहानी कहती है। उस कहानी में दर्द है, बिछड़ने का ग़म है, उजड़े हुए घर की ख़ामोशी है मगर उसी कहानी में बापू की मौजूदगी भी है। और शायद यही उस इतिहास की सबसे बड़ी सीख है घर उजड़ सकते हैं, लोग बिछड़ सकते हैं, ज़ख़्म पीढ़ियों तक रह सकते हैं लेकिन इंसानियत की आवाज़ अगर ज़िंदा रहे, तो उम्मीद कभी नहीं मरती।

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