तीन दिवसीय लोक नाट्य महोत्सव अपना महोत्सव - 2025-26 का प्रथम दिन





पटना। आज दिनांक 23 फरवरी 2026 को रंगसृष्टि, पटना अपने वार्षिक नाट्य महोत्सव के अंतर्गत ‘‘अपना महोत्सव - 2025-26’’ का आयोजन कला एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से किया जा रहा है। इस आयोजन का उद्घाटन पद्मश्री सुधा वर्गीज, कीर्ति अलोक (जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी, पटना), श्री प्रसदीप कुमार (प्रोजेक्ट डायरेक्टर, पटना मेट्रो) एवं वरुण सिंह (अध्यक्ष, कला संस्कृति प्रकोष्ट, भाजपा) के द्वारा दीप प्रज्योलित किया गया।




इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बिहार की लोक संस्कृति को लोगों के जीवन में बनाए व बचाए रखना है। यह नाट्य महोत्सव कई लोक विद्याओं का रंग-संगम है जो तीन दिवसीय लोक नाट्य महोत्सव के रूप में आज जनता के बीच में है।

‘‘अपना महोत्सव - 2025-26’’ के प्रथम दिन दो कार्यक्रमों को प्रेमचंद रंगशाला के वाह्य परिसर में रखा गया । प्रथम ‘‘जट जटिन’’ लोक नृत्य की प्रस्तुति रूपम नृत्य मंजरी फॉंउन्डेशन, पटना के द्वारा किया गया। द्वितीय ‘‘लोक गाथा गायन’’ की प्रस्तुति ‘अभिनय रंगमंडल, मसौढ़ी के संतोष तूफानी एवं कलाकारों ने दिया । प्रथम दिन मंचीय प्रस्तूति में नाट्य संस्था ‘‘रंगसृष्टि’, पटना की नवीनतम प्रस्तूति मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘‘अलग्योझा’’ का मंचन बिहार कला पुरस्कार से सम्मानित श्री सनत कुमार के निर्देशन में किया गया।




रंगसृष्टि ने अपने नाट्य महोत्व में यह हमेंशा प्रयास किया है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच कर उन्हें रंग गतिविधियों से जोडे। सुदूर गांव में जो संस्थाऐं कार्य कर रहीं है उन्हें मुख्य धारा से जोडा जा सके ताकि हम ग्रामीण रंगमंच को तथा ग्रामीण कलाकार नागरीय रंगमंच को समझ सके और अपना विकास कर सके। साथ ही साथ जनता को उत्कृष्ट अभिनय एवं नाटक से परिचित करा सकें । अच्छे विचारों से जनता में सद्भाव एवं एकता का संचार किया जा सके। 

“अलग्योझा” प्रेमचंद की एक अत्यंत संवेदनशील और यथार्थपरक कहानी है, जिसमें संयुक्त परिवार की भावना, त्याग, स्वार्थ, अहंकार और पश्चाताप का मार्मिक चित्रण किया गया है। कहानी का केंद्र पात्र रग्घू है, जो अपने पिता भोला महतो की मृत्यु के बाद पूरे परिवार का सहारा बन जाता है। बचपन से ही उसने कठिनाइयाँ झेली थीं। सौतेली माँ पन्ना के व्यवहार और परिस्थितियों ने उसे समय से पहले ही परिपक्व बना दिया। पिता के निधन के बाद घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ जाती है। वह अपने छोटे भाइयों का पालन-पोषण पूरी निष्ठा, प्रेम और त्याग के साथ करता है।




रग्घू का स्वभाव सरल, सहनशील और कर्तव्यनिष्ठ है। वह परिवार को टूटने से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करता है। पन्ना भी समय के साथ उसकी सच्चाई और भलमनसाहत को समझने लगती है। परिवार में मेल-मिलाप बना रहता है और घर की स्थिति धीरे-धीरे सुधरती है।

लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब रग्घू की पत्नी मुलिया घर में आती है। मुलिया स्वभाव से स्वार्थी और संकुचित सोच वाली है। उसे संयुक्त परिवार की व्यवस्था पसंद नहीं आती। उसे लगता है कि रग्घू की मेहनत का लाभ दूसरे उठा रहे हैं। वह अलग घर बसाने की जिद करने लगती है। रग्घू बहुत समझाने की कोशिश करता है, क्योंकि वह जानता है कि अलग होने से केवल घर नहीं बँटेगा, दिल भी बँट जाएंगे। वह परिवार के बिखरने की कल्पना से ही टूट जाता है।




अंततः परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि परिवार में बँटवारा हो जाता है। आँगन में दीवार खिंच जाती है, खेत अलग हो जाते हैं और चूल्हे अलग जलने लगते हैं। यह अलगाव रग्घू को भीतर से तोड़ देता है। जिस परिवार को उसने अपने खून-पसीने से सँवारा था, उसी से दूर होकर वह मानसिक पीड़ा में घुलने लगता है। निरंतर परिश्रम, चिंता और मन के बोझ के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। वह समय से पहले बूढ़ा और बीमार हो जाता है। अंततः असहनीय तनाव और अभाव के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है।

रग्घू की मृत्यु मुलिया के लिए एक गहरा आघात बनती है। उसे एहसास होता है कि उसके हठ और स्वार्थ ने एक समर्पित और प्रेमपूर्ण व्यक्ति की जिंदगी छीन ली। उसे समाज की उपेक्षा और अपने निर्णय का बोझ झेलना पड़ता है। दूसरी ओर पन्ना का हृदय विशाल और उदार बना रहता है। वह मुलिया और उसके बच्चों को अपनाए रखती है। समय बीतने पर परिवार में फिर से अपनापन और समझ की भावना जन्म लेती है।

कहानी के अंत में यह स्पष्ट हो जाता है कि संयुक्त परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंधों का ताना-बाना है। स्वार्थ, अहंकार और संकीर्ण सोच रिश्तों को तोड़ देते हैं, जबकि त्याग, प्रेम और विश्वास परिवार की असली नींव हैं।




“अलग्योझा” हमें यह सिखाती है कि परिवार का सुख केवल अलग रहने में नहीं, बल्कि मिल-जुलकर कठिनाइयों का सामना करने में है। स्वार्थ क्षणिक संतोष दे सकता है, परंतु उसका परिणाम अक्सर विनाशकारी होता है। प्रेम और त्याग ही जीवन और परिवार को स्थायी आधार प्रदान करते हैं। इस प्रस्तुति को दर्शकों ने खुब सराहा।


इस नाटक में भाग लेने वाले कलाकार
मंच पर

सुत्रधार -1 - अमन कुमार
सुत्रधार -2 - सत्यम मिश्रा
रघु - आदर्श आर पटेल
पन्ना - तन्नु प्रिया
मुलिया - आईशा कृति
केदार - हर्ष कुमार
खुन्नु - रवि रौशन कुमार देव  
लडकी - तन्नु प्रिया-2

कोरस गायन - कुणाल कुमार, उतम कुमार, नेहाल, 
संगीत संयोजन एवं हारमोनियम - चंदन उगना
ढोलक - राकेश कुमार चौधरी
कलार्नेट - नुर मोहम्मद
झाल एवं खंजरी - नेहाल कुमार सिंह निर्मल
प्रकाश परिकल्पना - राज कपूर
बैकग्राउझड म्युजिक - देवेन्द्र कुमार झा
वस्त्र विन्यास - रीना कुमारी
मेकअप - उदय सागर
उदघोषक - नेहाल कुमार सिंह निर्मल
मिडिया : लोक पंच 
नाटृयरूप, परिकल्पना एवं निर्देशन - सनत कुमार

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