सात दिन की अंतरिम ज़मानत पर शरजील इमाम जेल से बाहर—काको की गलियों में खुशी, मगर बरसों के इंतज़ार का दर्द भी





सैयद आसिफ़ इमाम काकवी की ख़ास रिपोर्ट :


न्यूज डेस्क। रविवार का दिन था। सुबह से ही काको की फ़िज़ाओं में एक ख़बर धीरे-धीरे फैल रही थी। ख़बर छोटी थी, लेकिन उसका असर बहुत बड़ा था शरजील इमाम सात दिनों की अंतरिम ज़मानत पर तिहाड़ जेल, दिल्ली से बाहर आ गए। लंबे इंतज़ार के बाद जब यह ख़बर काको पहुंची तो ऐसा लगा जैसे किसी घर के बंद दरवाज़े पर अचानक रोशनी दस्तक दे गई हो। चेहरे पर खुशी थी, आंखों में नमी थी और दिलों में बरसों से दबा हुआ एक सुकून था। दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने UAPA मामले में आरोपी शरजील इमाम को 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर 2026 तक सात दिनों की अंतरिम ज़मानत दी है। 




अदालत ने यह राहत उन्हें अपने चचेरे भाइयों की शादी में शामिल होने के लिए दी है। उन्हें 10 अक्टूबर की शाम तक जेल प्रशासन के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। लेकिन काको के लिए यह सिर्फ़ अदालत का एक आदेश नहीं है। यह एक परिवार के लिए बरसों बाद मिली सांस है। यह एक मां के लिए अपने बेटे को कुछ दिनों तक अपनी आंखों के सामने देखने की खुशी है। यह उन रिश्तेदारों के लिए भावुक कर देने वाला पल है, जिन्होंने लंबे समय तक सिर्फ़ तस्वीरों और मुलाक़ातों के सहारे अपने रिश्ते को ज़िंदा रखा। काको सिर्फ़ शरजील इमाम का आबाई वतन नहीं है, बल्कि वह उनकी पहचान, उनकी जड़ों और उनके परिवार की सदियों पुरानी यादों से जुड़ी मिट्टी है। यह वही काको है, जिसकी गलियों में उनके बुज़ुर्गों के कदमों की आहट रही है और जिसकी फ़िज़ाओं में उनके खानदान की यादें आज भी सांस लेती हैं। 




शरजील इमाम, मरहूम अकबर इमाम मल्लिक साहब के बड़े फ़रज़ंद, मरहूम हसन इमाम साहब के बड़े पोते हैं। एक पढ़े-लिखे, इल्म से जुड़े और उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान के रूप में उनकी पहचान काको की मिट्टी से भी जुड़ी हुई है। किसी इंसान की पहचान सिर्फ़ उसके नाम से नहीं होती। उसके पीछे एक खानदान होता है, एक घर होता है, एक मोहल्ला होता है, एक मिट्टी होती है और काको शरजील इमाम के लिए वही मिट्टी है। आज जब छह साल से अधिक लंबे इंतज़ार के बाद वह सात दिनों की अंतरिम ज़मानत पर जेल से बाहर आए हैं, तो काको के लोगों की भावनाएं सिर्फ़ एक ख़बर तक सीमित नहीं हैं। यह उस बेटे की वापसी का एहसास है जिसकी जड़ें इसी मिट्टी में हैं। बरसों से काको की गलियों ने उनके परिवार की खुशियां और परेशानियां देखी हैं। आज जब शरजील अपने लोगों के बीच पहुंचे हैं, तो कई आंखों में खुशी के आंसू हैं। यह आंसू किसी राजनीतिक नारे के नहीं, बल्कि रिश्तों के हैं। यह खुशी किसी सियासत की नहीं, बल्कि इंसानियत की है। एक पढ़े-लिखे नौजवान के जीवन के छह साल से अधिक समय जेल की चारदीवारी में गुज़र जाना किसी भी परिवार के लिए आसान नहीं हो सकता। ईद आई होगी, बक़रीद आई होगी, त्योहार आए होंगे, रिश्तेदारों के घर शादियां हुई होंगी मगर परिवार के लिए हर खुशी में एक कमी रही होगी।




और आज, जब वह कुछ दिनों के लिए ही सही, अपने लोगों के बीच हैं, तो काको की फ़िज़ाओं में जैसे बरसों पुरानी एक ख़ामोशी टूट गई है। काको अपने इस बेटे को आज भी उसकी मिट्टी, उसके खानदान और उसकी इंसानी पहचान के साथ देखता है। कानून अपना काम करेगा, अदालत अपना फैसला देगी और सच का अंतिम फैसला न्याय की चौखट पर ही होगा। लेकिन इंसानियत यह ज़रूर पूछती है कि एक मां के इंतज़ार की कोई मियाद होती है क्या? आज काको की दुआ है या अल्लाह! इस घर की खुशी को स्थायी कर दे, इस मां की आंखों के आंसुओं को मुस्कान में बदल दे और जिस भी व्यक्ति का मामला अदालत में है, उसे कानून के मुताबिक़ इंसाफ़ अता फरमा।

काको की मिट्टी ने बहुत से लोगों को जन्म दिया है। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें समय भी मिटा नहीं सकता। शरजील इमाम काको की उसी मिट्टी का बेटा हैं और आज जब वह बरसों बाद अपने आबाई वतन की फ़िज़ाओं में हैं, तो काको की गलियां सिर्फ़ उन्हें देख नहीं रहीं, बल्कि उन्हें महसूस कर रही हैं।शरजील इमाम की ज़िंदगी के बीते छह साल से अधिक समय को अगर एक परिवार की नज़र से देखा जाए तो यह सिर्फ़ कैलेंडर के कुछ पन्ने नहीं हैं। यह सैकड़ों सुबहें हैं, सैकड़ों रातें हैं, त्योहारों की अनगिनत तारीख़ें हैं और हर तारीख़ के साथ जुड़ी एक नई उम्मीद है। कितनी ईदें आईं और चली गईं। कितनी बक़रीदें गुज़र गईं। कितने त्योहार आए, लोगों ने नए कपड़े पहने, अपनों से गले मिले, घरों में खुशियां मनाईं लेकिन किसी मां की आंखें शायद हर बार उसी दरवाज़े को तलाशती रहीं, जहां से उसका बेटा लौटकर नहीं आया। मां के लिए बेटे की कमी को कोई शब्द पूरा नहीं कर सकता। वह मां जो अपने बेटे की सलामती के लिए हर रात दुआ करती रही होगी, आज जब अपने बेटे को सामने देख रही होगी तो उसके लिए ये सात दिन शायद सात दिनों से कहीं ज़्यादा हैं। काको की गलियों में आज खुशी है। मगर यह खुशी सिर्फ़ हंसने की खुशी नहीं है। इसमें बरसों का दर्द घुला हुआ है।

किसी की आंखों में आंसू हैं तो किसी के चेहरे पर मुस्कान। कोई अल्हम्दुलिल्लाह कह रहा है तो कोई बेटे की सलामती की दुआ कर रहा है। घर की चौखट पर लौटता हुआ कोई अपना हमेशा खुशी लेकर आता है, लेकिन जब वही अपना छह साल से अधिक समय बाद कुछ दिनों के लिए लौटे तो उस पल की कीमत वही समझ सकता है जिसने इंतज़ार किया हो। आज काको ने सिर्फ़ एक व्यक्ति को जेल से बाहर आते नहीं देखा, बल्कि एक परिवार को कुछ पलों के लिए फिर से पूरा होते देखा है। इस खुशी के बीच कुछ सवाल भी हैं, जिन्हें भावनाओं से अलग रखकर कानून और इंसाफ़ की रोशनी में देखना ज़रूरी है। किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और अदालत द्वारा दोष साबित होना एक ही बात नहीं है। कानून हर आरोपी को सुनवाई का अधिकार देता है और अंतिम फैसला अदालत करती है। इसीलिए सवाल किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने का नहीं, बल्कि न्याय की प्रक्रिया के लंबे इंतज़ार का है।

छह साल से अधिक समय बहुत लंबा होता है। एक परिवार के लिए यह इंतज़ार कितना कठिन होता होगा यह वही जान सकता है जिसने हर तारीख़ के बाद अगली तारीख़ का इंतज़ार किया हो। सवाल यही है आख़िर कब तक? कब तक एक मां अपने बेटे की वापसी का इंतज़ार करती रहेगी? कब तक भाई अपने भाई से खुलकर मिलने के लिए तरसता रहेगा? कब तक घर के किसी कोने में एक तस्वीर देखकर परिवार खुद को समझाता रहेगा कि एक दिन सब ठीक होगा? शरजील इमाम के मामले में अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक विचार हो सकते हैं। कोई उनके विचारों से सहमत हो सकता है और कोई असहमत। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अपनी बात रखने का अधिकार। लेकिन किसी भी विचारधारा से ऊपर इंसानियत है। एक मां की पीड़ा का कोई राजनीतिक रंग नहीं होता। एक परिवार के इंतज़ार का कोई मज़हब नहीं होता। जेल में बंद किसी व्यक्ति से मिलने के लिए तरसते रिश्तेदारों के आंसुओं की कोई पार्टी नहीं होती। इंसाफ़ का मतलब यही है कि कानून अपना काम करे, अदालतें स्वतंत्र रूप से फैसला करें और हर व्यक्ति को न्याय की पूरी प्रक्रिया का अधिकार मिले। 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक के ये सात दिन शरजील इमाम और उनके परिवार के लिए शायद बहुत लंबे समय के बाद आए सबसे अनमोल दिन हैं। इन सात दिनों में शादी की खुशियां होंगी। रिश्तेदार मिलेंगे। परिवार साथ बैठेगा। शायद पुराने दिनों की बातें होंगी। मां अपने बेटे को जी भरकर देखेगी। लेकिन 10 अक्टूबर की तारीख़ भी सामने होगी। और यही बात इस खुशी को अधूरा कर देती है। दुआ है कि जिस घर में आज बरसों बाद खुशी लौटी है, वहां यह खुशी सिर्फ़ सात दिनों की मेहमान बनकर न रहे। दुआ है कि कानून अपना निष्पक्ष रास्ता तय करे और न्याय की प्रक्रिया जल्द अपने मुकाम तक पहुंचे।

या अल्लाह! जिस मां की आंखों में आज बरसों बाद सुकून के आंसू आए हैं, उसे वह दिन भी दिखा जब उसके बेटे के लौटने के लिए कोई तारीख़ तय न हो।

आज काको की फ़िज़ाओं में यही दुआ है हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई मिले, हर दोषी को कानून के मुताबिक़ सज़ा मिले और अगर कोई बेगुनाह है तो उसे इंसाफ़ के साथ जल्द आज़ादी मिले। क्योंकि इंसाफ़ सिर्फ़ अदालत का फैसला नहीं है।इंसाफ़ उस दिन पूरा होता है, जब किसी मां का इंतज़ार खत्म होता है, किसी घर का सन्नाटा टूटता है और किसी परिवार को अपने बिछड़े हुए अपने के साथ बेख़ौफ़ बैठने का हक़ मिलता है। आज काको की आंखें नम हैं, लेकिन इन आंसुओं में उम्मीद है।अल्हम्दुलिल्लाह बेटा घर आया है। अब दुआ सिर्फ़ इतनी है ये सात दिन एक नई शुरुआत बनें, और इंतज़ार का यह लंबा सफ़र जल्द अपने अंजाम तक पहुंचे।

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