सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
गयाजी का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही पवित्र और प्रेरणादायक भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह भूमि गयासुर की तपस्या और भगवान विष्णु के वरदान से मोक्षधाम बनी। यही वह स्थान है जहाँ माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति कराई थी। तभी से गया को मोक्ष नगरी कहा जाता है। आज भी यही परंपरा जीवित है। गयाजी… केवल पिंडदान की धरती नहीं, बल्कि मानवता, करुणा, आस्था और सनातन संस्कारों की वह पवित्र भूमि है, जहां रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि इंसानियत से भी बनते हैं। यह वही धरती है जहां लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना लेकर आते हैं। लेकिन गयाजी की मिट्टी की खूबसूरती तब और बढ़ जाती है, जब कोई उन आत्माओं के लिए भी खड़ा होता है, जिनके अपने शायद उन्हें अंतिम संस्कार, तर्पण या पिंडदान देने के लिए यहां तक नहीं पहुंच सके। इसी मानवीय सोच को वर्षों से अपने जीवन का संकल्प बनाए हुए हैं समाजसेवी चंदन कुमार सिंह। बाबू सुरेश नारायण मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले चंदन कुमार सिंह अपने पिता स्वर्गीय सुरेश नारायण द्वारा वर्ष 2001 में शुरू की गई सामूहिक पिंडदान और तर्पण की परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। वर्ष 2001 में शुरू हुई यह परंपरा अब 2026 में अपने 26वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। स्वर्गीय सुरेश नारायण ने देश-दुनिया में हादसों, हिंसा, प्राकृतिक आपदाओं और विभिन्न त्रासदियों में असमय जान गंवाने वाले उन लोगों की आत्मा की शांति के लिए गयाजी में सामूहिक पिंडदान की शुरुआत की थी, जिनके लिए शायद कोई अपना यहां मौजूद नहीं था। उन्होंने वर्षों तक इस परंपरा को निभाया। उनके निधन के बाद उनके पुत्र चंदन कुमार सिंह ने पिता की इस सेवा को अपनी जिम्मेदारी और जीवन का संकल्प बना लिया। समय बदला… पीढ़ी बदली… लेकिन इंसानियत का यह दीपक बुझने नहीं दिया गया। 4 अक्टूबर 2026 को गयाजी में एक बार फिर उन ज्ञात-अज्ञात दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए सामूहिक पिंडदान और तर्पण किया जाएगा, जिनके अपने किसी कारणवश गयाजी नहीं पहुंच सके। इस वर्ष विशेष रूप से 2025 और 2026 में दुनिया से रुख़सत हुए लोगों को भी इस सामूहिक पिंडदान में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाएगा। यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उन परिवारों और उन आत्माओं के प्रति संवेदना का भाव है, जिनकी कहानी अधूरी रह गई और जिनके लिए शायद कोई अपना अंतिम संस्कार या पिंडदान करने वाला नहीं था।
गयाजी के पावन देवघाट और फल्गु नदी के तट पर विधि-विधान के साथ पिंडदान, तर्पण और पूजा-अर्चना की जाएगी। दिवंगत आत्माओं की शांति और मोक्ष के लिए भगवान श्रीहरि से प्रार्थना की जाएगी। इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां रिश्ता खून का नहीं, इंसानियत का होता है। जिसका कोई अपना गयाजी नहीं पहुंच सका, उसके लिए कोई दूसरा व्यक्ति पुत्र बनकर खड़ा हो जाता है। और शायद इसी भावना को एक पंक्ति में कहा जा सकता है जिसका कोई नहीं, उसका गयाजी में कोई तो है। चंदन कुमार सिंह का यह प्रयास केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक गहरी मानवीय संवेदना है उन लोगों के लिए सम्मान, जिन्होंने किसी हादसे, हिंसा, आपदा या किसी अन्य त्रासदी में असमय अपनी जान गंवाई। कई बार किसी परिवार के पास अपने दिवंगत परिजन को गयाजी लाने की स्थिति नहीं होती। कई बार मृतक की पहचान तक नहीं हो पाती। और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि दुनिया से विदा होने वाले व्यक्ति के लिए पीछे कोई अपना नहीं बचता। ऐसे में गयाजी की धरती पर कोई उनके लिए पिंडदान करता है, तर्पण करता है और उनकी आत्मा की शांति की कामना करता है। यही तो इंसानियत है। सुरेश नारायण ने वर्ष 2001 में जो दीपक जलाया था, उसकी लौ आज 26 साल बाद भी जल रही है। उस दीपक की रोशनी में न जाति है, न मजहब; न अपना है, न पराया। वह रोशनी सिर्फ इतना कहती है कि मौत इंसान को हमसे छीन सकती है, लेकिन इंसानियत उसे हमारी यादों से कभी नहीं मिटने देती। चंदन कुमार सिंह अपने पिता की इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए हर वर्ष उन दिवंगत आत्माओं के लिए गयाजी की पावन धरती पर श्रद्धा अर्पित करते हैं, जिनके लिए शायद कोई दूसरा हाथ उठाने वाला नहीं। आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है और इंसान कई बार अपने ही रिश्तों से दूर होता जा रहा है, ऐसे समय में गयाजी की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि मानवता की कोई सीमा नहीं होती। एक पिता ने शुरुआत की थी। एक बेटे ने उसे अपना संकल्प बना लिया। और अब 26 वर्षों से यह परंपरा कह रही है जिसका कोई नहीं, उसका भी कोई है। यही गयाजी की मिट्टी की पुकार है। यही फल्गु की धारा का संदेश है। और यही उस इंसानियत का दीपक है, जो 2001 में जला था और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ रोशन है। गयाजी की मिट्टी में आज भी जिंदा है इंसानियत पिंडदान से लेकर सूफ़ी दरगाहों और बोधगया तक—जहाँ धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत एक है।
चंदन कुमार सिंह कहते हैं कि यह पिंडदान केवल उन लोगों के लिए नहीं है, जिनके परिवार उन्हें याद करने गयाजी पहुंचते हैं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है, जिनका इस दुनिया में शायद कोई अपना नहीं बचा, जो उनके लिए कर्मकांड कर सके।उनके शब्दों में, “यह कार्य किसी एक परिवार या व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज और पूरी मानवता को समर्पित है।”
यही सोच इस परंपरा को साधारण कर्मकांड से उठाकर एक बड़े मानवीय संदेश में बदल देती है।इस वर्ष का पितृपक्ष भी गयाजी के लिए खास रहा। देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा लेकर यहां पहुंचे। फल्गु के तट पर आस्था उमड़ी, मंदिरों में घंटियां गूंजीं और गयाजी ने एक बार फिर दुनिया को अपनी उस पहचान का एहसास कराया, जहां धर्म, आस्था, संस्कार और संस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं।
लेकिन गयाजी की पहचान केवल पिंडदान और आस्था तक सीमित नहीं है। गयाजी जहाँ मंदिर की घंटी और दरगाह की अज़ान साथ सुनाई देती है यह वही गया है जिसकी मिट्टी में सूफ़ी संतों की मोहब्बत भी रची-बसी है। यहां हज़रत सैयद शाह मोहम्मद हसन अल्वी गया’वी और शाह नसीर गया’वी रह. जैसे बुज़ुर्गों की दरगाहें आज भी लोगों को मोहब्बत, अमन और भाईचारे का पैग़ाम देती हैं। और कुछ ही दूरी पर बोधगया है वह पवित्र धरती जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस लिहाज़ से गया केवल एक धार्मिक नगर नहीं, बल्कि हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध परंपराओं के अद्भुत सांस्कृतिक संगम की पहचान है। यहां आस्था के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मंज़िल में एक ही भावना दिखाई देती है शांति, मुक्ति और इंसानियत। इस मानवीय परंपरा की सबसे खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली बात यह है कि पिंडदान की प्रक्रिया के बाद दूध का सेवन एक मुस्लिम परिवार के घर से करने की परंपरा पिछले 25 वर्षों से चली आ रही है।
यह दृश्य अपने आप में एक पूरी कहानी कहता है। जहां एक ओर हिंदू श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम परिवार इस परंपरा का हिस्सा बनकर सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहज़ीब और सामाजिक भाईचारे को जीवंत करता है। यह केवल एक रस्म नहीं दिलों के मिलने की एक तस्वीर है। चंदन कुमार सिंह की इस मानवीय परंपरा में गया के प्रतिष्ठित लोग भी वर्षों से साथ खड़े रहे हैं। वरिष्ठ संपादक शफ़ी अहमद और जदयू अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष सादिक अख़्तर पिछले लगभग 25 वर्षों से इस परंपरा में लगातार अपनी सहभागिता निभाते आ रहे हैं।
इनकी मौजूदगी इस बात की गवाही देती है कि इंसानियत किसी एक मज़हब की जागीर नहीं। यहां आस्था अपनी जगह है, मज़हब अपनी जगह है और परंपराएं अपनी जगह लेकिन जब बात इंसानियत की आती है तो सभी रास्ते एक जगह आकर मिल जाते हैं। गया की मिट्टी में आज भी बुज़ुर्गों की दुआएं हैं, उलेमा का इल्म है, फ़क़ीरों की सादगी है, मंदिरों की घंटियों की गूंज है और बोधिवृक्ष की शांति है। यहां फल्गु की धारा केवल पिंडदान की साक्षी नहीं बनती, बल्कि वह सदियों से चली आ रही उस साझी संस्कृति की भी गवाह है जिसमें एक-दूसरे के दुख में साथ खड़ा होना ही सबसे बड़ा धर्म माना गया। आज जब समाज में दूरियां पैदा करने वाली बातें सुनाई देती हैं, तब गयाजी खामोशी से एक बहुत बड़ा संदेश देता है दीवारें इंसान बनाता है।
मोहब्बत उन्हें गिरा देती है। चंदन कुमार सिंह की यह 26 वर्षों से चली आ रही परंपरा उसी मोहब्बत की एक जीवंत मिसाल है। गयाजी हमें सिखाता है कि किसी दिवंगत आत्मा के लिए किया गया पिंडदान केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि स्मृति, श्रद्धा और संवेदना का प्रतीक है।
और जब इस श्रद्धा के साथ किसी दूसरे मज़हब का परिवार भी खड़ा हो जाए, जब वर्षों तक शफ़ी अहमद और सादिक अख़्तर जैसे लोग साथ निभाएं, तो वह परंपरा केवल कर्मकांड नहीं रहती वह इंसानियत की इबारत बन जाती है। शायद इसीलिए गयाजी की सबसे बड़ी पहचान यही है यहां मोक्ष की तलाश में आने वाला इंसान अंततः इंसानियत का अर्थ भी सीखकर लौटता है। गयाजी की धरती आज भी कहती है मज़हब अलग हो सकते हैं, रिवाज़ अलग हो सकते हैं, पूजा के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन दर्द एक है, दुआ एक है और इंसानियत सबसे ऊपर है। और शायद यही गयाजी की असली विरासत है। गयाजी सिर्फ़ एक शहर नहीं एक एहसास है,
एक संस्कृति है, एक मोहब्बत है,
और सबसे बढ़कर… इंसानियत की जिंदा मिसाल है। 4 अक्टूबर 2026 को गयाजी में होने वाला यह सामूहिक पिंडदान उन सभी दिवंगत आत्माओं को समर्पित होगा, जिनके लिए किसी अपने की प्रतीक्षा शायद कभी पूरी नहीं हुई।




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