सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
कभी-कभी इंसान की जिंदगी में मुश्किलों का ऐसा दौर आता है कि खुशियां भी उसके दरवाजे तक पहुंचकर लौट जाती हैं। आंखों में उम्मीद होती है, दिल में घर लौटने की खुशी होती है, परिवार के चेहरे पर मुस्कान आने की उम्मीद होती है, लेकिन तभी हालात एक नया इम्तिहान लेकर सामने खड़े हो जाते हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आज़म खान और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म खान की रिहाई का मंजर भी कुछ ऐसा ही रहा। 31 अक्टूबर 2026 को रामपुर जेल से दोनों बाहर आए तो उनके चाहने वालों की आंखों में खुशी के आंसू थे। कितने दिनों से लोग अपने महबूब नेता की एक झलक पाने के इंतजार में थे। कितनी दुआएं की गई थीं, कितनी उम्मीदें लगाई गई थीं। लोगों को लगा कि आखिरकार मुश्किलों का एक लंबा दौर खत्म हुआ, अब आज़म खान अपने परिवार के बीच लौटेंगे, अपने लोगों से मिलेंगे और जिंदगी के कुछ सुकून भरे पल गुजार सकेंगे। लेकिन अफसोस! यह खुशी कुछ ही मिनटों की मेहमान साबित हुई। जेल के दरवाजे से बाहर निकलते ही ईडी की टीम ने आज़म खान को एक दूसरे मामले में अपनी हिरासत में ले लिया। अब्दुल्लाह आज़म खान घर चले गए, लेकिन उनके पिता की रिहाई की खुशी एक बार फिर गिरफ्तारी के अंधेरे में बदल गई। इसके बाद उन्हें गाजियाबाद की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। अब वह डासना जेल में रहेंगे।
आखिर यह कैसी विडंबना है कि एक इंसान को जेल से बाहर आने की खुशी भी नसीब नहीं हुई? जिस परिवार ने अपने घर के बुजुर्ग की वापसी का सपना देखा था, उसकी खुशियां फिर अधूरी रह गईं। आजम खान: एक नाम नहीं, उत्तर प्रदेश की सियासत का लंबा इतिहास। आज़म खान कोई सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं हैं। वह उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। रामपुर की सियासत से अपनी पहचान बनाने वाले आज़म खान कई बार विधायक चुने गए, सांसद बने और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने विधानसभा से लेकर संसद तक अपनी राजनीतिक आवाज बुलंद की। उनके समर्थकों के लिए वह केवल एक नेता नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान और हिस्सेदारी की आवाज हैं। उनके भाषणों, उनके राजनीतिक संघर्ष और उनके लंबे सार्वजनिक जीवन ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। उनकी राजनीति से असहमति हो सकती है, उनके बयानों की आलोचना हो सकती है और उनके फैसलों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनके दशकों के राजनीतिक सफर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में किसी नेता का विरोध करना गलत नहीं, लेकिन विरोध के नाम पर न्याय के सिद्धांतों को कमजोर करना भी उचित नहीं। मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी: एक सपना, एक संघर्ष और हजारों बच्चों का भविष्य। आज़म खान का नाम आते ही रामपुर की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का जिक्र भी जरूरी हो जाता है। इस विश्वविद्यालय को उन्होंने अपनी जिंदगी के बड़े सपनों में शामिल किया। उनका दावा और उनके समर्थकों का विश्वास रहा है कि इस संस्थान के जरिए शिक्षा से वंचित तबकों के बच्चों को बेहतर अवसर देने की कोशिश की गई। मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय को लेकर आज वित्तीय लेन-देन और अन्य मामलों में जांच चल रही है।
ईडी ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं। यदि किसी तरह की आर्थिक अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दस्तावेजों की जांच हो, हिसाब-किताब सामने आए और अदालत में जो आरोप साबित हों, उनके अनुसार कानून अपना काम करे। लेकिन एक सवाल यह भी है कि उस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले हजारों विद्यार्थियों का क्या होगा? उन शिक्षकों और कर्मचारियों का क्या होगा जिनकी रोजी-रोटी इस संस्थान से जुड़ी है? किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि शिक्षा का सपना देखने वाले बच्चों का भविष्य भी अंधकार में डाल दिया जाए। शिक्षा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं, बल्कि समाज की धरोहर होती है। रिहाई के कुछ मिनट बाद गिरफ्तारी: आखिर जनता सवाल क्यों न पूछे? 31 अक्टूबर की शाम रामपुर जेल के बाहर जमा लोगों के लिए वह क्षण बेहद भावुक था। लोग अपने नेता के स्वागत के लिए खड़े थे। किसी की आंखों में खुशी थी तो किसी के चेहरे पर वर्षों का इंतजार साफ दिखाई दे रहा था। लेकिन जैसे ही आज़म खान बाहर आए, ईडी की कार्रवाई ने इस खुशी को मातम जैसी मायूसी में बदल दिया। फिर रात भर पूछताछ, फिर अदालत में पेशी और फिर डासना जेल। मीडिया के सवाल पर आज़म खान का जवाब, ''अब कुछ कहने को नहीं बचा'', कई लोगों के दिलों को छू गया। यह एक छोटा-सा वाक्य था, लेकिन इसके पीछे एक लंबे संघर्ष और थकान का एहसास दिखाई दिया। आखिर एक व्यक्ति कितनी बार अदालतों, जेलों और पूछताछ के दौर से गुजरेगा? हम यह नहीं कहते कि आज़म खान कानून से ऊपर हैं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन कानून का उद्देश्य न्याय देना है, किसी को लगातार मानसिक और सामाजिक परेशानी में रखना नहीं। यदि उनके खिलाफ नए आरोप हैं तो उनकी जांच होनी चाहिए, लेकिन हर कार्रवाई पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। अदालत में दोष साबित होने से पहले किसी को अपराधी मान लेना भी गलत है। एक नेता की गिरफ्तारी, लेकिन दर्द पूरे परिवार का। राजनीति की खबरों में हम अक्सर धाराएं, मुकदमे, अदालतें और बयान पढ़ते हैं, लेकिन इन सबके पीछे एक परिवार की जिंदगी भी होती है। एक पत्नी होती है जो हर दिन अपने पति की वापसी की उम्मीद करती है। बच्चे होते हैं जो अपने पिता के साथ कुछ वक्त बिताना चाहते हैं। परिवार के बुजुर्ग और रिश्तेदार होते हैं जो हर नई खबर के साथ बेचैन हो उठते हैं। आज़म खान की रिहाई के बाद दोबारा गिरफ्तारी ने उनके परिवार की उम्मीदों को फिर झटका दिया। क्या किसी परिवार का यह हक नहीं कि वह अपने प्रियजन के साथ सामान्य जिंदगी जी सके? कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन मानवीय संवेदना भी कोई छोटी चीज नहीं। किसी भी आरोपी के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए। क्या विपक्ष की आवाज को कमजोर करने का दौर है? आज देश और उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्ष और सरकार के बीच टकराव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। विपक्षी दलों के कई नेता केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाते रहे हैं। सरकार और जांच एजेंसियां अपनी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताती हैं। ऐसे में सबसे जरूरी है कि जांच निष्पक्ष दिखाई भी दे और हो भी। यदि आरोप मजबूत हैं तो अदालत में साबित किए जाएं। यदि कोई व्यक्ति निर्दोष है तो उसे न्याय मिले। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक और राजनीतिक अधिकार है। मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहां सत्ता के साथ-साथ विपक्ष की आवाज भी सुरक्षित हो। 2027 में उत्तर प्रदेश की जनता देगी जवाब! उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव होने हैं। उस चुनाव में जनता केवल नेताओं के भाषण नहीं सुनेगी, बल्कि सरकार के कामकाज, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों की समस्याओं और कानून-व्यवस्था का भी हिसाब लेगी।
आज़म खान का मामला भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता है। रामपुर से लेकर लखनऊ तक इस मुद्दे पर लोगों की अपनी-अपनी राय होगी। लेकिन अंतिम फैसला जनता के हाथ में है। वोट की ताकत किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। जनता सब कुछ देखती है, घटनाओं को याद रखती है और चुनाव के दिन अपनी राय जाहिर करती है। यदि किसी कार्रवाई को जनता अन्यायपूर्ण समझती है तो वह अपने मत के जरिए अपनी नाराजगी व्यक्त कर सकती है। सरकार को भी यह समझना होगा कि सत्ता हमेशा के लिए नहीं होती। आज जो सत्ता में हैं, कल उन्हें भी जनता के सवालों का सामना करना पड़ सकता है। आखिर में बस इतना कहना है कि आज़म खान के खिलाफ आरोपों का फैसला अदालत करे, लेकिन उनके साथ न्याय होना चाहिए। न किसी को कानून से ऊपर रखा जाए और न किसी को कानून के नाम पर न्याय से वंचित किया जाए। रामपुर जेल के बाहर अपने नेता की एक झलक पाने के लिए खड़े लोगों की आंखों में आज भी इंतजार है। वे फिर उस दिन का सपना देख रहे हैं जब आज़म खान अपने परिवार और चाहने वालों के बीच होंगे। जुल्म की रात कितनी भी लंबी क्यों न हो, इंसाफ की उम्मीद कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। इतिहास में सत्ता के अनेक दौर आए और चले गए, लेकिन जनता की आवाज हमेशा कायम रही है। आज आज़म खान जेल में हैं, लेकिन उनके चाहने वालों का इंतजार जिंदा है। आज उनकी आवाज खामोश हो सकती है, लेकिन न्याय का सवाल खामोश नहीं होना चाहिए। आज़म थे, आज़म हैं और आज़म रहेंगे! अल्लाह से दुआ है कि उन्हें इंसाफ मिले, उनके परिवार की परेशानियां दूर हों और देश में संविधान, कानून, इंसानियत तथा लोकतंत्र की गरिमा हमेशा कायम रहे। आमीन!




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