सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
बिहार चुनाव की आहट तेज़ है और अचानक पटना की सियासी फ़िज़ा में कुछ ऐसी तस्वीरें दिखाई देने लगी हैं, जिन पर ठहरकर सोचने की ज़रूरत है।रोहिणी आचार्य पटना आईं। लोगों से मिल रही हैं। पुराने रिश्तों को जोड़ रही हैं। यहां तक कि साधु यादव के घर जाकर उनसे मुलाक़ात की। दूसरी तरफ़ तेजस्वी यादव भी अब मैदान में दिखाई दे रहे हैं औरंगाबाद, रफ़ीगंज, जहानाबाद जैसे इलाक़ों का दौरा कर रहे हैं, लोगों से मिल रहे हैं और पार्टी की गतिविधियों में पहले से अधिक सक्रिय नज़र आ रहे हैं। सवाल यही है यह सक्रियता चुनाव की मजबूरी है या आरजेडी की ज़मीन को फिर से महसूस करने की शुरुआत? काश, यह सक्रियता सिर्फ़ चुनाव तक सीमित न रहे। काश, तेजस्वी यादव पिछले चार-पांच वर्षों में भी इसी तरह बिहार की गलियों, गांवों और अपने पुराने कार्यकर्ताओं के बीच दिखाई देते।
क्योंकि बिहार की राजनीति सिर्फ़ पटना की प्रेस कॉन्फ़्रेंस से नहीं चलती। बिहार की राजनीति गांव की चौपाल से चलती है। मैंने आरजेडी को बहुत क़रीब से देखा है। इसलिए यह बात किसी राजनीतिक दुश्मनी से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की बेचैनी से लिख रहा हूं जिसने इस पार्टी को उसके पुराने दौर में भी देखा है और आज के दौर में भी देख रहा है। लालू प्रसाद यादव के दौर की आरजेडी में एक अलग किस्म का जुनून था। कार्यकर्ता नेता के लिए खड़ा रहता था। गांव का आदमी पार्टी को अपना समझता था। गरीब, पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक और समाज के हाशिये पर खड़ा व्यक्ति यह महसूस करता था कि उसकी आवाज़ सत्ता तक पहुंचाने वाला कोई है। आज सवाल यह है कि क्या वही भरोसा अब भी उतनी ही ताक़त से मौजूद है? मेरी नज़र में आरजेडी की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, उसका अपना संगठन है। कई जगह पार्टी के भीतर पद पाने की दौड़ दिखाई देती है। जिला अध्यक्ष कौन बनेगा, कमेटी में किसका नाम आएगा, किसकी पैरवी चलेगी इन सवालों ने अगर संगठन की राजनीति को घेर लिया, तो जनता के असली सवाल पीछे छूट जाएंगे। पार्टी पद से नहीं, कार्यकर्ता से बनती है। और चुनाव पोस्टर से नहीं, बूथ पर खड़े कार्यकर्ता से जीता जाता है।
यही वह जगह है जहां आरजेडी को गंभीर आत्ममंथन की ज़रूरत है। आरजेडी को देखकर आज उसके कई पुराने समर्थक यह सवाल करते हैं कि क्या पार्टी धीरे-धीरे उस ज़मीनी स्वरूप से दूर हो रही है, जिसने उसे बिहार की बड़ी राजनीतिक ताक़त बनाया था? कहीं ऐसा तो नहीं कि लालू प्रसाद यादव की विशाल राजनीतिक छाया के बाद संगठन उस ऊर्जा को उसी रूप में आगे नहीं बढ़ा पाया? आज पार्टी के पास बड़े नेता हैं, सोशल मीडिया है, प्रेस कॉन्फ़्रेंस हैं, राजनीतिक बयान हैं लेकिन क्या हर जिले में वही पुराना जनसंपर्क है? क्या हर प्रखंड में वही कार्यकर्ता सक्रिय है? क्या हर गांव में पार्टी का कोई ऐसा चेहरा मौजूद है, जो जनता की परेशानी में उसके साथ खड़ा हो? यही असली परीक्षा है।आरजेडी को अगर फिर से जनता के दिल में अपनी पुरानी जगह बनानी है तो उसे कैमरे से ज़्यादा कैमरे के बाहर के बिहार की तरफ़ देखना होगा। मुस्लिम वोटर भी सवाल पूछ रहा है आरजेडी के पारंपरिक सामाजिक आधार की चर्चा मुस्लिम मतदाताओं के बिना अधूरी है। वर्षों से बिहार के मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने आरजेडी का साथ दिया है। लेकिन अब वही मतदाता सिर्फ़ भाषण नहीं, राजनीतिक हिस्सेदारी भी चाहता है। टिकटों के बंटवारे को लेकर मुस्लिम समाज में उठ रहे सवालों को भी पार्टी को गंभीरता से लेना चाहिए। वोट की उम्मीद और प्रतिनिधित्व की उपेक्षा यह रिश्ता लंबे समय तक नहीं चल सकता।
मुस्लिम समाज को सिर्फ़ चुनावी गणित का हिस्सा नहीं, बल्कि राजनीतिक भागीदार समझना होगा। जिस समाज ने संकट के समय साथ दिया हो, उसके भीतर की बेचैनी को सुनना भी नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है। आज जब बिहार में चुनावी मुकाबला सामने है, आरजेडी और कांग्रेस का अलग-अलग चुनाव लड़ना भी राजनीतिक बहस का बड़ा विषय है। लेकिन गठबंधन हो या अलग चुनाव आख़िरकार जनता के बीच जाकर वोट मांगना ही पड़ेगा।और वहां कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं होगी। वहां सवाल होंगे बेरोज़गारी के सवाल होंगे। महंगाई के सवाल होंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल होंगे। जातीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल होंगे। और सबसे बड़ा सवाल होगा आप पांच साल कहां थे?
रोहिणी आचार्य की सक्रियता को सिर्फ़ पारिवारिक या राजनीतिक घटना मानकर छोड़ देना भी ठीक नहीं होगा। उनका लोगों के घर जाना, पुराने रिश्तों को याद करना और अलग-अलग लोगों से मिलना यह संदेश दे सकता है कि राजनीति में संवाद के दरवाज़े अभी बंद नहीं हुए हैं। साधु यादव से मुलाक़ात ने भी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है। लेकिन असली सवाल मुलाक़ात का नहीं है। असली सवाल है क्या आरजेडी अपने पुराने रिश्तों को राजनीतिक संवाद में बदल पाएगी? क्या नाराज़ लोगों को वापस लाया जाएगा? क्या पुराने कार्यकर्ताओं को फिर सम्मान मिलेगा? क्या पार्टी के दरवाज़े सिर्फ़ पद चाहने वालों के लिए नहीं, बल्कि काम करने वालों के लिए भी खुलेंगे? मैं तेजस्वी यादव से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं रखता। बल्कि उनसे उम्मीद रखता हूं। क्योंकि बिहार को एक मजबूत विपक्ष चाहिए।
बिहार को ऐसे नेता चाहिए जो जनता के बीच रहें। ऐसे नेता चाहिए जो चुनाव के बाद भी उसी गांव में वापस जाएं जहां चुनाव के समय वोट मांगने गए थे।इसलिए दिल से यही कहना चाहता हूं काश, तेजस्वी यादव फिर वही पुराने वाले तेजस्वी बनें।
वही तेजस्वी, जिन्हें बिहार का युवा अपने भविष्य की उम्मीद समझता था। वही तेजस्वी, जो सड़क पर उतरकर जनता की आवाज़ बनते थे। वही तेजस्वी, जिनके पीछे सिर्फ़ नेता नहीं, बल्कि आम कार्यकर्ता भी दिखाई देता था। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा पद मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री नहीं होता। सबसे बड़ा पद जनता के दिल में होता है। और जनता के दिल तक पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टर से उतरना काफी नहीं। कभी-कभी नेता को अपने कार्यकर्ता के घर की चारपाई पर बैठना पड़ता है।चाय पीनी पड़ती है। उसकी तकलीफ़ सुननी पड़ती है। उसकी नाराज़गी सहनी पड़ती है। और फिर कहना पड़ता है तुम हमारे साथ थे, हम भी तुम्हारे साथ हैं।” यही लालू प्रसाद यादव की राजनीति की बड़ी ताक़त थी।
आरजेडी को अगर फिर से वही ताक़त चाहिए तो उसे सिर्फ़ लालू प्रसाद यादव की विरासत का नाम नहीं लेना होगा। उस विरासत को जीना होगा। बिहार चुनाव आरजेडी के लिए सिर्फ़ सीटों का चुनाव नहीं है। यह उसके लिए आत्ममंथन का चुनाव भी है। जनता फैसला करेगी कि आरजेडी अभी भी वही ज़मीनी पार्टी है या फिर वह धीरे-धीरे ऐसी पार्टी बनती जा रही है, जिसमें ज़मीन से ज़्यादा संगठन की कुर्सियां और पद महत्वपूर्ण हो गए हैं। मेरी उम्मीद अब भी बाकी है। क्योंकि आरजेडी के पास इतिहास है। लालू प्रसाद यादव की विरासत है। करोड़ों लोगों की राजनीतिक यादें हैं। और सबसे बढ़कर हज़ारों-लाखों पुराने कार्यकर्ताओं की मेहनत है। बस ज़रूरत है उस सोई हुई ऊर्जा को जगाने की। रोहिणी पटना आई हैं। तेजस्वी मैदान में निकले हैं।
अब देखना यह है कि क्या चुनाव के बाद भी ये कदम बिहार की ज़मीन पर चलते रहेंगे? यही सवाल है। यही उम्मीद है। और शायद यही आरजेडी की अगली राजनीतिक कहानी भी।






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