ज्ञानेश हटाओ, लोकतंत्र बचाओ मार्च के बाद बड़ा सवाल: क्या तेजस्वी के आसपास की सियासी रणनीति उन्हें मजबूत कर रही है या कमजोर?



  • तेजस्वी जी, सड़क पर उतरना काफी नहीं सियासत में दिमाग, रणनीति और साथ चाहिए
  • "ज्ञानेश हटाओ, लोकतंत्र बचाओ" मार्च के बाद बड़ा सवाल: क्या तेजस्वी के आसपास की सियासी रणनीति उन्हें मजबूत कर रही है या कमजोर?

सैयद आसिफ इमाम काकवी


पटना : पटना की सड़कों पर आज विपक्ष ने अपनी ताकत दिखाई। शहीद स्मारक से राजभवन तक निकला मार्च, हाथों में तख्तियां, जुबान पर नारे और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल बिहार की राजधानी का सियासी तापमान अचानक बढ़ गया। ज्ञानेश हटाओ, लोकतंत्र बचाओ” का नारा गूंजा। महागठबंधन के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव सड़क पर उतरे। कार्यकर्ता उतरे। नेता उतरे। समर्थक उतरे। लेकिन अब जरा रुककर एक कठिन सवाल पूछना भी जरूरी है क्या सिर्फ़ सड़क पर उतर जाने से राजनीति जीती जा सकती है? मेरा जवाब है नहीं। राजनीति केवल भीड़ का नाम नहीं है। राजनीति समय की नब्ज पहचानने, सही मुद्दा चुनने, सही सहयोगी को साथ रखने और सही वक्त पर सही फैसला लेने का नाम है। और यहीं तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। मुद्दा बड़ा है, लेकिन क्या टाइमिंग सही है?




वोट और चुनावी प्रक्रिया का सवाल निश्चित रूप से बहुत बड़ा सवाल है। लोकतंत्र में मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता पर उठने वाले हर सवाल का जवाब मिलना चाहिए। लेकिन विपक्ष को यह भी सोचना होगा कि जनता के बीच मुद्दा किस रूप में जा रहा है? क्या जनता इसे अपने अधिकार की लड़ाई मान रही है या इसे केवल राजनीतिक दलों का संघर्ष समझ रही है? यही फर्क किसी आंदोलन को जनआंदोलन बनाता है। आज तेजस्वी यादव ने बड़ा राजनीतिक मुद्दा उठाया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे के पीछे उतनी ही मजबूत रणनीति भी है?




क्योंकि नारा लगाने से आंदोलन शुरू होता है, रणनीति से आंदोलन सफल होता है। तेजस्वी यादव को अपने आसपास झांकना होगा तेजस्वी यादव की राजनीतिक रणनीति कौन बना रहा है? कौन उन्हें सलाह देता है? कौन तय करता है कि कब सड़क पर उतरना है? कौन तय करता है कि किस नेता को साथ रखना है और किससे संवाद बढ़ाना है? कौन यह देखता है कि महागठबंधन के भीतर कौन खुश है, कौन नाराज़ है और कौन केवल अपनी राजनीति चमकाने में लगा है?





राजनीति में सबसे बड़ा खतरा विरोधी नहीं होता। कई बार सबसे बड़ा खतरा गलत सलाह होती है। अगर सलाह सही हो तो कमजोर नेता भी मजबूत हो सकता है और अगर सलाह गलत हो तो मजबूत नेता भी धीरे-धीरे कमजोर दिखाई देने लगता है। मुकेश सहनी की बात को हल्के में लेना भूल होगी मुकेश सहनी का हालिया इंटरव्यू भी महागठबंधन के नेतृत्व के लिए पढ़े जाने लायक राजनीतिक संकेत है। गठबंधन बनाकर राजनीति करनी है तो हर बात मंच पर नहीं कही जा सकती। कुछ बातें बंद कमरे में होती हैं। कुछ मतभेद बातचीत से सुलझाए जाते हैं। कुछ फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। गठबंधन में अहंकार की जगह नहीं होती। कांग्रेस, राजद, वाम दल, वीआईपी और दूसरे सहयोगी हर दल की अपनी जमीन है। हर नेता का अपना सामाजिक प्रभाव है। अगर हर कोई अपनी-अपनी राजनीति बचाने में लग गया तो गठबंधन कैसे बचेगा? तेजस्वी यादव को यह समझना होगा कि सिर्फ़ अपने समर्थकों को खुश करके बिहार की सत्ता नहीं जीती जा सकती। बिहार की राजनीति में साथ लेकर चलना पड़ता है। 




लालू यादव की सबसे बड़ी ताकत क्या थी? लालू प्रसाद यादव को उनके समर्थक भले ही अलग-अलग नामों से याद करें, लेकिन उनकी राजनीति की एक बड़ी ताकत थी सामाजिक समीकरणों को पढ़ने की क्षमता। वे जानते थे कि कौन सा समाज किस समय क्या सोच रहा है। वे जानते थे कि किसे साथ रखना है, किससे दूरी बनानी है और किसे सम्मान देकर राजनीतिक रूप से अपने साथ जोड़ा जा सकता है। तेजस्वी यादव के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे केवल लालू यादव की विरासत के सहारे न चलें। उन्हें अपनी राजनीतिक पहचान बनानी होगी। लालू की छाया से निकलकर तेजस्वी को अपना सूरज बनना होगा। और यह काम भाषणों से नहीं होगा। इसके लिए जमीन पर संगठन चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोग अपना भविष्य बना रहे हैं और तेजस्वी का नुकसान? यह सवाल कड़वा है, लेकिन पूछना जरूरी है। राजनीति में हमेशा कुछ ऐसे लोग होते हैं जो नेता के आसपास रहकर अपना राजनीतिक भविष्य मजबूत करते हैं। वे नेता की हर बात पर तालियां बजाते हैं। हर फैसले को सही बताते हैं। हर गलती को भी उपलब्धि बताकर पेश करते हैं। लेकिन असली सलाहकार वह होता है जो नेता के सामने खड़े होकर कह सके यह फैसला गलत है। तेजस्वी यादव को ऐसे लोगों की जरूरत है। उन्हें सिर्फ़ प्रशंसक नहीं चाहिए। उन्हें ऐसे राजनीतिक साथी चाहिए जो आईना दिखा सकें। तेजस्वी जी, डरिए मत लेकिन जल्दबाजी भी मत कीजिए बिहार की जनता राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक है। वह सिर्फ़ भीड़ नहीं देखती। वह नेता का चरित्र देखती है। वह यह देखती है कि नेता संकट में किसके साथ खड़ा रहा। वह यह देखती है कि नेता ने अपने सहयोगियों को कितना सम्मान दिया। और सबसे महत्वपूर्ण वह यह देखती है कि नेता के पास कल की योजना क्या है। 

आज पटना में मार्च हो गया। कल क्या? परसों क्या? एक सप्ताह बाद क्या? एक महीने बाद क्या?bअगर इसका जवाब तैयार नहीं है तो आंदोलन केवल एक दिन की तस्वीर बनकर रह जाएगा। धरना एक दिन का हो सकता है, राजनीति रोज़ करनी पड़ती है। बिहार को नारा नहीं, नई राजनीतिक रणनीति चाहिए तेजस्वी यादव के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। अगर वे इस आंदोलन को व्यापक लोकतांत्रिक अभियान में बदलना चाहते हैं तो उन्हें गांवों तक जाना होगा। छोटे कार्यकर्ता से बात करनी होगी। सहयोगी दलों को बराबरी का सम्मान देना होगा। समाज के हर वर्ग से संवाद करना होगा। और सबसे बढ़कर अपनी टीम पर पुनर्विचार करना होगा। क्योंकि बिहार में जनता अब सिर्फ़ यह नहीं पूछेगी कि तेजस्वी के साथ कितने लोग हैं? जनता यह भी पूछेगी तेजस्वी के पास बिहार के लिए योजना क्या है? 




आज पटना की सड़क पर लोकतंत्र का नारा लगा है। अब अगली परीक्षा यह है कि यह नारा कितनी दूर जाता है। अगर सवाल वोट का है तो जवाब भी वोट की भाषा में देना होगा। अगर सवाल लोकतंत्र का है तो लोकतांत्रिक मर्यादा भी बनाए रखनी होगी। अगर सवाल संविधान का है तो तथ्य और प्रमाण के साथ लड़ाई लड़नी होगी। और अगर सत्ता चाहिए तो सिर्फ़ विरोध नहीं विकल्प भी देना होगा। तेजस्वी यादव के लिए आज का मार्च अंत नहीं, शुरुआत है। अब उन्हें तय करना है कि वे केवल भीड़ के नेता बनेंगे या बिहार की राजनीति के गंभीर रणनीतिकार। क्योंकि इतिहास उन नेताओं को याद नहीं रखता जो सिर्फ़ नारे लगाते हैं। इतिहास उन्हें याद रखता है जो सही समय पर सही फैसला लेते हैं। और बिहार आज तेजस्वी यादव से शायद यही पूछ रहा है तेजस्वी जी, सड़क पर उतर आए हैं… अब बताइए, आगे की राह क्या है?” वोट जनता का है।लोकतंत्र जनता का है। फैसला भी जनता का होगा। और राजनीति में जनता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं होता।

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