काको में फिर सजेगा सूफ़ियाना रंग, मगर अब सूफ़ी महोत्सव को महज़ महफ़िल नहीं, एक मिशन बनना चाहिए




सैयद आसिफ़ इमाम काकवी

पटना : काको शरीफ़ की रूहानी और तारीखी सरज़मीन एक बार फिर सूफ़ियाना रंग में डूबने जा रही है। हज़रत मख़दूमा बीबी कमाल अलैहि रहमा के सालाना उर्स के मौक़े पर 24 और 25 सितंबर 2026 को काको, ज़िला जहानाबाद में सूफ़ी महोत्सव का आयोजन होने जा रहा है। 

बिहार सरकार के पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन, जहानाबाद के संयुक्त तत्वावधान में होने वाला यह आयोजन यक़ीनन काको की पहचान और उसकी सदियों पुरानी सूफ़ी रिवायत के लिए एक अहम मौक़ा है। काको के लोग इस महोत्सव को लेकर बेहद उत्साहित हैं। देश के कई नामचीन कलाकार अपनी फ़नकारी पेश करेंगे और काको-जहानाबाद की अपनी सरज़मीन से जुड़े मशहूर निज़ामी ब्रदर्स भी सूफ़ियाना कलाम पेश करने आ रहे हैं। मुख्य कार्यक्रम काको मध्य विद्यालय परिसर में होगा। इससे पहले हज़रत बीबी कमाल की दरगाह पर चादरपोशी की जाएगी और अमन, चैन, मोहब्बत, भाईचारे तथा मुल्क की ख़ुशहाली के लिए दुआएँ माँगी जाएँगी। यह मंज़र यक़ीनन दिल को छू लेने वाला होगा। मगर इस ख़ुशी के साथ एक सवाल मेरे दिल में लगातार दस्तक देता है क्या सूफ़ी महोत्सव सिर्फ़ दो दिनों की रौनक बनकर रह जाए? क्या सूफ़ियत का मतलब सिर्फ़ रोशनी, सजावट, मंच, कलाकार और क़व्वाली है?नहीं!सूफ़ियत एक फ़िक्र है।सूफ़ियत एक तहज़ीब है।सूफ़ियत मोहब्बत का नाम है। सूफ़ियत इंसानियत का पैग़ाम है। सूफ़ियत दिलों को जोड़ने की ताक़त है। और सबसे बढ़कर सूफ़ियत इल्म, अमन और भाईचारे की रौशनी है। 






इसीलिए मेरी यह गुज़ारिश किसी शिकायत के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और अपनी रूहानी विरासत के दर्द से निकली एक आवाज़ के तौर पर है। बिहार सरकार और जहानाबाद जिला प्रशासन को इस बार सूफ़ी महोत्सव को सिर्फ़ एक सांस्कृतिक इवेंट नहीं, बल्कि सूफ़ी फ़िक्र और इल्म का बड़ा मरकज़ बनाने की कोशिश करनी चाहिए। देश के नामवर सूफ़ी शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, उलेमा, शोअरा, साहित्यकारों, प्रोफ़ेसरों और सूफ़ी तहज़ीब पर काम करने वाले अहल-ए-इल्म को बुलाया जाना चाहिए। हज़रत मख़दूमा बीबी कमाल की ज़िंदगी और उनकी रूहानी ख़िदमात पर बाक़ायदा इल्मी गुफ़्तगू हो। काको की सूफ़ी तारीख़, उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब और बर्रे-सग़ीर की रूहानी रिवायत पर सेमिनार हों। सूफ़ियाना कलाम ज़रूर हो, लेकिन सूफ़ियत पर कलाम भी हो। क़व्वाली ज़रूर हो, मगर उसके साथ इल्म की आवाज़ भी गूँजे। मंच पर फ़नकार हों, मगर उनके साथ वे अहल-ए-इल्म भी हों जिन्होंने अपनी ज़िंदगी सूफ़ी तारीख़ और अदब की तहक़ीक़ में लगा दी। काको के सूफ़ी रिसर्च सेंटर का अधूरा ख़्वाब कब पूरा होगा? यह सवाल आज भी मेरे दिल में ज़िंदा है। 

लगभग 2011 में काको को सूफ़ी सर्किट से जोड़ने के साथ सूफ़ी रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी का एक ख़्वाब देखा गया था। मक़सद था कि हज़रत बीबी कमाल अलैहि रहमा, काको की सूफ़ी तारीख़, सूफ़ी साहित्य और यहाँ की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर देश-विदेश के शोधकर्ता अध्ययन कर सकें। मगर साल गुज़रते गए और यह ख़्वाब आज भी अधूरा है। आख़िर कब तक? अगर काको सूफ़ी सर्किट है, तो उसका अपना स्थायी सूफ़ी रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी क्यों नहीं? काको को सिर्फ़ दो दिनों की सजावट नहीं चाहिए। काको को अपनी तारीख़ की हिफ़ाज़त चाहिए। काको को किताब चाहिए। काको को शोध चाहिए। काको को नौजवान शोधकर्ताओं के लिए दरवाज़े खोलने होंगे।

हमें यह भी सोचना चाहिए कि बीबी कमाल की रूहानी विरासत को आने वाली नस्लें किस तरह जानेंगी? क्या सिर्फ़ हर साल एक महोत्सव से? या फिर किसी ऐसी स्थायी संस्था के ज़रिए जहाँ उनकी ज़िंदगी, उनकी तालीम, उनकी रूहानी ख़िदमत और काको की तारीख़ किताबों और दस्तावेज़ों में महफ़ूज़ हो?

मेरी एक और दिली गुज़ारिश है कि सरकारी कार्यक्रमों में सम्मान की रवायत को भी नई दिशा दी जाए। हर साल मेहमानों को मोमेंटो देना अपनी जगह अच्छी रवायत है, लेकिन इस बार उन लोगों को भी सामने लाया जाए जिन्होंने सूफ़ी अदब, इतिहास, तहज़ीब और इंसानियत की ख़िदमत की है। क्यों न बिहार सरकार की ओर से “काको सूफ़ी विरासत सम्मान” शुरू किया जाए? क्यों न सूफ़ी साहित्य और काको की तारीख़ पर शोध करने वाले नौजवानों को सम्मानित किया जाए? क्यों न इस मौक़े पर सूफ़ी रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी के लिए कोई ठोस ऐलान किया जाए? ऐसा होगा तो सूफ़ी महोत्सव की रौनक़ सिर्फ़ दो दिनों की नहीं रहेगी, बल्कि उसका असर आने वाली नस्लों तक पहुँचेगा।

हमारे इलाक़े की ख़ूबसूरती यही है कि यहाँ ख़ानक़ाहें सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने इंसानियत, मोहब्बत, भाईचारे और इल्म को बढ़ावा दिया। हज़रत बीबी कमाल की सरज़मीन से निकलने वाला पैग़ाम किसी एक मज़हब या एक तबक़े तक महदूद नहीं हो सकता। सूफ़ियत की असल रूह तो इंसान को इंसान से जोड़ना है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि 24 और 25 सितंबर की रात काको में जब सूफ़ियाना कलाम गूँजे तो उसके साथ यह आवाज़ भी उठे

नफ़रत नहीं, मोहब्बत चाहिए।
दूरी नहीं, रिश्ते चाहिए। सिर्फ़ तमाशा नहीं, इल्म चाहिए।
सिर्फ़ महफ़िल नहीं, मिशन चाहिए। 

आइए इस बार सूफ़ी महोत्सव को एक नई पहचान दें। काको को सिर्फ़ पर्यटन स्थल नहीं, सूफ़ी इल्म, अदब, तहज़ीब और इंसानियत का मरकज़ बनाइए। सूफ़ी महोत्सव को मेला नहीं मिशन बनाइए। 2011 के अधूरे ख़्वाब को अब हक़ीक़त बनाइए। यही हज़रत मख़दूमा बीबी कमाल अलैहि रहमा की रूहानी विरासत का सच्चा सम्मान होगा। और शायद काको की मिट्टी भी यही कह रही है चराग़ जलाइए ऐसा कि रौशनी सदियों तक रहे, महफ़िल सजाइए ऐसी कि मोहब्बत दिलों में रहे, और विरासत बचाइए ऐसी कि आने वाली नस्लें कहें हाँ, यहाँ कभी बीबी कमाल की रूहानी रौशनी हुआ करती थी।” या अल्लाह! काको की इस रूहानी सरज़मीन को हमेशा आबाद रख, बीबी कमाल की रूहानी बरकतें इस बस्ती पर क़ायम रख और यहाँ से निकलने वाली हर आवाज़ को अमन, मोहब्बत, इल्म और इंसानियत का पैग़ाम बना। आमीन।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ