सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
पटना : अज़ीमाबाद की सरज़मीन हमेशा से इल्म-ओ-अदब, तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त, तसव्वुफ़ और शायरी की शानदार रिवायत की अमीन रही है। यहाँ की गलियों, ख़ानक़ाहों, कुतुबख़ानों और अदबी महफ़िलों में सदियों से अल्फ़ाज़ की ख़ुशबू बस्ती आई है। इसी रोशन रिवायत को आगे बढ़ाते हुए 13 सितंबर 2026 की शाम मुहिब्बान-ए-उर्दू के ज़ेरे-एहतिमाम केंद्रीय कुतुबख़ाना, ख़ानक़ाह-ए-मुनअमिया, मीतन घाट, पटना सिटी में एक बा-वक़ार और यादगार अदबी महफ़िल का इनइक़ाद हुआ। महफ़िल का उनवान था “राहत इंदौरी और अंजुम रहबर—जदीद ग़ज़ल के शोअरा, एक गुफ़्तगू।”
शाम साढ़े छह बजे शुरू हुई यह महफ़िल रात लगभग दस बजे तक जारी रही, मगर वक़्त गुज़रने का एहसास नहीं हुआ। जब गुफ़्तगू में अदब हो, लबों पर शेर हों, दिल में उर्दू की मोहब्बत हो और फ़िज़ा में ख़ानक़ाह की रूहानियत हो, तो वक़्त भी जैसे ठहर जाता है। यह महफ़िल महज़ एक अदबी प्रोग्राम नहीं, बल्कि उर्दू ज़बान, जदीद ग़ज़ल, तहज़ीबी विरसे और इंसानी एहसासात के बीच एक ख़ूबसूरत मुकालमा थी। महफ़िल की सदारत जनाब अरशद फ़िरोज़ साहब, साबक़ चेयरमैन, गवर्नमेंट उर्दू लाइब्रेरी, पटना ने फ़रमाई, जबकि निज़ामत जनाब परवेज़ अनवर साहब, सदर, मुहिब्बान-ए-उर्दू, पटना ने निहायत शाइस्ता और अदबी अंदाज़ में अंजाम दी। डॉक्टर इज़हार अहमद साहब, साबक़ रुक्न-ए-असेंबली और “प्यारी उर्दू” के सरपरस्त-ए-आला, ख़ुसूसी मेहमान की हैसियत से शरीक हुए। महफ़िल में सरवर सलाम, जनरल सेक्रेटरी, उर्दू एक्शन कमेटी, शाख़ फूलवारी शरीफ़; परवेज़ आलम, जनरल सेक्रेटरी, इल्मी मजलिस; सैयद आसिफ़ इमाम काकवी, जावेद अरहम, एजाज़ रसूल, ज़ीशान रसूल, सैयद शाह जमाल काकवी, अनवर इमाम, हसन कटकवी, नायाब समेत बड़ी तादाद में अहल-ए-अदब, सहाफ़ी, शोअरा, दानिश्वर और अज़ीज़ान-ओ-अहबाब मौजूद रहे। महफ़िल की ख़ास बात यह रही कि हज़रत सैयद शाह शमीमुद्दीन अहमद मुनअमी साहब ख़ुद शरीक न हो सके, मगर उनकी मोहब्बत, दुआएँ और अदबी वाबस्तगी हर लम्हा महसूस होती रही। कुछ शख़्सियतें जिस्मानी तौर पर मौजूद न होकर भी अपनी मोहब्बत और दुआओं से पूरी महफ़िल में मौजूद रहती हैं। दिल से दुआ है कि अल्लाह तआला उन्हें सेहत और आफ़ियत अता फ़रमाए और ख़ानक़ाह-ए-मुनअमिया की इल्मी व अदबी ख़िदमात को मज़ीद वुसअत अता फ़रमाए। आमीन।
राहत इंदौरी की शायरी में मोहब्बत भी है और एहतेजाज भी, रूमानी एहसास भी है और समाजी शऊर भी। वहीं अंजुम रहबर की शायरी में निसवानी एहसास, मोहब्बत, रिश्तों और ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ रंग नज़र आते हैं। दोनों के अंदाज़ अलग हैं, मगर दोनों की शायरी में एक मुश्तरका ख़ूबी है—दिल की बात को इस तरह कहना कि वह सीधे आम इंसान के दिल तक पहुँच जाए। मीतन घाट की इस महफ़िल को ख़ास बनाने में वहाँ की रूहानी फ़िज़ा का भी अहम किरदार था। गंगा की ठंडी हवाएँ, ख़ानक़ाह की पुरसुकून फ़िज़ा, किताबों की ख़ुशबू और अहल-ए-इल्म की मौजूदगी ने ऐसा माहौल पैदा किया जिसमें इंसान कुछ देर के लिए दुनिया के शोर से दूर होकर अपने अंदर झाँकने लगता है।
मेरे नज़दीक मीतन घाट सिर्फ़ एक मक़ाम नहीं, बल्कि एक एहसास है, जहाँ तारीख़, रूहानियत, अदब और इंसानियत एक-दूसरे से हमकलाम होते महसूस होते हैं। आज जब नौजवान नस्ल मोबाइल और सोशल मीडिया की तेज़ रफ़्तार दुनिया में घिरी हुई है, ऐसे समय में कुतुबख़ाने में अदबी महफ़िल का इनइक़ाद बेहद क़ाबिल-ए-क़द्र पहल है। किताब सिर्फ़ काग़ज़ के सफ़हों का नाम नहीं; किताब एक नस्ल की फ़िक्र को दूसरी नस्ल तक पहुँचाने का ज़रिया है। क़लम रुक जाता है, मगर उससे निकला ख़याल नस्लों तक सफ़र करता रहता है। मेरे लिए इस महफ़िल में शिरकत भी महज़ एक रस्मी मौजूदगी नहीं थी। सहाफ़त और अदब दोनों मेरे लिए समाज को समझने के ज़रिये हैं। सहाफ़त हमें हक़ीक़त दिखाती है, जबकि अदब उस हक़ीक़त के पीछे छिपे इंसानी दर्द और एहसास को आवाज़ देता है। राहत इंदौरी और अंजुम रहबर के हवाले से दिल से निकले कुछ मिसरे रिश्ते बिखर गए, मगर अल्फ़ाज़ रह गए, मोहब्बत के कुछ ख़ूबसूरत राज़ रह गए। वक़्त ने जुदा कर दिया दोनों को राहों में, मगर शायरी में दोनों आज भी साथ रह गए। यही शायरी का कमाल है—इंसान चला जाता है, मगर उसके अल्फ़ाज़ ज़िंदा रहते हैं। वक़्त फ़ासले पैदा कर देता है, मगर अच्छी शायरी दिलों के दरमियान पुल बनाती रहती है। महफ़िल में सरवर सलाम साहब ने अपना मक़ाला पेश कर राहत इंदौरी को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। डॉक्टर इज़हार अहमद साहब और सदर-ए-महफ़िल अरशद फ़िरोज़ साहब ने भी अपने क़ीमती ख़यालात का इज़हार किया। दीगर अहल-ए-अदब ने राहत इंदौरी और अंजुम रहबर की शायरी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर अपने तास्सुरात पेश किए। मैं मुहिब्बान-ए-उर्दू के तमाम मुंतज़िमीन, तमाम मेहमानों, अहल-ए-क़लम, शोअरा, सहाफ़ियों और अज़ीज़ान-ओ-अहबाब का दिल की गहराइयों से शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने अपनी शिरकत से इस शाम को यादगार बना दिया।
आख़िर में दिल से यही दुआ निकलती है या अल्लाह ख़ानक़ाह-ए-मुनअमिया की इस इल्मी, अदबी और रूहानी रौशनी को हमेशा क़ायम रख। इसे इल्म, अदब, मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे का मरकज़ बना। उर्दू की ख़िदमत करने वालों की कोशिशों को क़ुबूल फ़रमा और इस रोशन रिवायत को आने वाली नस्लों तक पहुँचाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन। मीतन घाट की मिट्टी जैसे आज भी यही पैग़ाम देती है नफ़रत नहीं, मोहब्बत बाँटो। दूरी नहीं, रिश्ते जोड़ो। ख़ामोशी नहीं, इल्म की बात करो। और अल्फ़ाज़ को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ न रहने दो, उन्हें इंसानियत की आवाज़ बना दो। यही उस शाम का हासिल था, यही इस अदबी महफ़िल का पैग़ाम था और शायद यही उर्दू की असल रूह भी है।





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