सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
पटना, 16 सितंबर 2026 : पटना स्थित राजकीय अभिलेखागार भवन में बुधवार को एक ऐसी अदबी, इल्मी और ऐतिहासिक महफ़िल सजी, जिसमें किताब का विमोचन महज़ एक औपचारिकता नहीं रहा, बल्कि इतिहास के उन पन्नों को फिर से पलटने की कोशिश बना, जिन पर आज़ादी के अनगिनत दीवानों की कुर्बानियों की दास्तान दर्ज है। बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय की ओर से आयोजित डॉ. वी. वी. मिश्र स्मृति व्याख्यान एवं पुस्तक विमोचन समारोह में डॉ. एम. ए. इब्राहीमी की चर्चित पुस्तक ‘आज़ादी के मुस्लिम शोहदा’ के चौथे संस्करण का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम में ‘आज़ादी के बाद बिहार की शिक्षा व्यवस्था’ विषय पर भी गंभीर विमर्श हुआ। अभी बहुत से नाम इतिहास की रोशनी से दूर हैं’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पुस्तक के लेखक डॉ. एम. ए. इब्राहीमी, पूर्व आईएएस एवं पूर्व कुलपति, ने आज़ादी की लड़ाई में योगदान देने वाले उन गुमनाम और अनजाने किरदारों पर शोध की ज़रूरत को रेखांकित किया, जिनका योगदान आज भी व्यापक रूप से सामने नहीं आ सका है। उन्होंने कहा कि आज़ादी की लड़ाई में हज़ारों मुसलमानों ने कुर्बानियां दीं, लेकिन ऐसे अनेक नाम अब भी लोगों की जानकारी से दूर हैं। आवश्यकता इस बात की है कि दस्तावेज़ों, अभिलेखों और प्रमाणिक स्रोतों के आधार पर ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों की पहचान की जाए और उनके योगदान को देश के सामने लाया जाए।
डॉ. इब्राहीमी ने यह भी चिंता व्यक्त की कि अज्ञात मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों पर शोध को लेकर जिस पहल का उन्होंने उल्लेख किया, वह अभी अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी है। उनका कहना था कि इस दिशा में गंभीर और प्रमाणिक शोध होना चाहिए, ताकि इतिहास में छूट गए किरदारों को उनका उचित स्थान मिल सके। शहादत की दास्तान को आने वाली नस्लों तक पहुँचाने की पुकार आज़ादी के मुस्लिम शोहदा’ केवल एक पुस्तक का नाम नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाने का प्रयास है जो इतिहास की किताबों के हाशिये पर छूट गए हैं। कौन थे वे लोग? कहाँ से आए थे? उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ क्या संघर्ष किया? किन हालात में अपनी जान गंवाई? और सबसे बड़ा सवाल क्या उनकी कुर्बानियों की कहानी हमारी आने वाली पीढ़ियां जानती हैं? यही सवाल आज पटना के अभिलेखागार भवन में हुए विमर्श की सबसे भावुक कड़ी बनकर सामने आया। शिक्षा, इतिहास और अभिलेख तीनों पर हुआ।
मंथन समारोह की अध्यक्षता डॉ. राकेश कुमार, प्राचार्य, राजकीय डिग्री महाविद्यालय, सरमेरा ने की। उन्होंने अभिलेखागार के प्रथम निदेशक डॉ. वी. वी. मिश्र की स्मृति में आज़ादी के बाद बिहार की शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा पर विस्तार से विचार रखे।
वक्ताओं ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था, ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के संरक्षण और शोध की आवश्यकता पर भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में डॉ. मुहम्मद फैसल अब्दुल्ला, निदेशक, अभिलेखागार, प्रो. सुधीर कुमार सिंह, प्राचार्य, वैशाली महिला कॉलेज, प्रो. डॉ. तौकीर आलम, मौलाना अनिसुर रहमान कासमी, अरशद अब्बास, अनवर उल्लाह, डॉ. इक़बाल शेराजी सहित अनेक शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
इस अवसर पर शिबली अल-कासमी, सैयद जावेद अहमद, सैयद आसिफ़ इमाम, मुहम्मद अजहरुद्दीन, संजीव सिंह और वसीम अहमद समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। मेरे लिए यह महज़ एक कार्यक्रम नहीं था इस ऐतिहासिक अवसर पर मैं सैयद आसिफ़ इमाम काकवी, अरशद अब्बास साहब और कई मोहतरम अदबी-इल्मी साथियों के साथ मौजूद रहा। सच कहूँ तो आज अभिलेख भवन में सिर्फ़ एक किताब का विमोचन नहीं हुआ आज इतिहास ने जैसे ख़ुद अपने भूले हुए पन्नों को आवाज़ दी। कुछ शहादतें किताबों में दर्ज हैं, कुछ दस्तावेज़ों में दब गईं, और कुछ नाम शायद वक़्त की धूल में कहीं खो गए। लेकिन हर वह इंसान जिसने हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए अपना आज क़ुर्बान किया, उसकी कहानी हमारे कल का हिस्सा है। आज़ादी किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की जागीर नहीं थी। यह उन तमाम हिंदुस्तानियों की साझा विरासत है जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना।
हमारा तिरंगा सिर्फ़ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं यह अनगिनत कुर्बानियों, सपनों और संघर्षों की निशानी है। और इसलिए इतिहास के उन गुमनाम चेहरों को तलाशना सिर्फ़ शोधकर्ताओं का काम नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी भी है। किताबें अलमारियों में बंद रखने के लिए नहीं होतीं। कुछ किताबें सोई हुई यादों को जगाने के लिए होती हैं। कुछ किताबें भूले हुए नामों को फिर से ज़िंदा करने के लिए होती हैं। आज पटना के अभिलेख भवन में ऐसी ही एक कोशिश दिखाई दी। उन तमाम ज्ञात-अज्ञात शहीदों को दिल से सलाम, जिनके बलिदान की वजह से आज हम एक आज़ाद हिंदुस्तान में सांस ले रहे हैं। और अब सवाल हमसे है क्या हम उन गुमनाम आज़ादी के दीवानों को खोजकर उनकी कहानी अपनी आने वाली नस्लों तक पहुँचा पाएंगे?





0 टिप्पणियाँ
if you have any doubts, please let me know.