काको में बीबी कमाल के उर्स-ए-पाक का आग़ाज़: कुरआनख़्वानी और फातिहा से गूंजी फिज़ा, अकीदतमंदों की उमड़ी भीड़




सैय्यद आसिफ़ इमाम काकवी

काको, जहानाबाद | 24 सितंबर 2026 : 

काको की रूहानी धरती पर आज हज़रत मख़दूमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा के दो दिवसीय उर्स-ए-पाक का आग़ाज़ हो गया। फज्र की नमाज़ के बाद आस्ताना-ए-मुबारक पर कुरआनख़्वानी और फातिहा के साथ उर्स की परंपरागत शुरुआत हुई। सुबह से ही अकीदतमंदों की आवाजाही शुरू हो गई और दिन चढ़ने के साथ आस्ताने और आसपास के इलाके में रूहानी माहौल दिखाई देने लगा। उर्स की व्यवस्थाओं में दरगाह निगरानी कमेटी, दरगाह इंतज़ामिया, आस्ताने के मुजाविर और काको टीम पूरी तरह सक्रिय दिखाई दिए। जायरीनों की सुविधा से लेकर आयोजन की विभिन्न व्यवस्थाओं तक कमेटी और स्थानीय कार्यकर्ता लगातार अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे।




भारत24 न्यूज़ नेटवर्क की टीम ने भी उर्स की गतिविधियों को मौके से दर्ज किया और काको की इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की। आज का दिन काको के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन की शुरुआत नहीं, बल्कि उस परंपरा की निरंतरता है जिसके साथ स्थानीय समाज की आस्था, स्मृतियां और सांस्कृतिक पहचान जुड़ी हुई है। सुबह फज्र की नमाज़ के बाद जब कुरआन की तिलावत शुरू हुई तो आस्ताने की फिज़ा में एक अलग ही गंभीरता और सुकून महसूस किया गया।




अकीदतमंद खामोशी के साथ बैठे रहे। कहीं दुआ के लिए हाथ उठे। कहीं फातिहा पढ़ी गई। और कहीं लोग अपने परिवार और समाज के लिए अमन और सलामती की दुआ करते दिखाई दिए। उर्स की शुरुआत की यह रस्म दरगाह की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। काको की सुबह आज आम सुबहों से अलग थी। आस्ताने की ओर जाने वाले रास्तों पर जायरीनों की आवाजाही थी और दरगाह परिसर में इंतज़ाम से जुड़े लोग लगातार सक्रिय थे। दरगाह निगरानी कमेटी की मौजूदगी हर स्तर पर रही उर्स जैसे बड़े आयोजन की सफलता केवल धार्मिक रस्मों से नहीं होती। इसके लिए व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। आज दरगाह निगरानी कमेटी और इंतज़ामिया की सक्रियता इसी बात को सामने ला रही थी। 





जायरीनों की आवाजाही, बैठने की व्यवस्था, तबर्रुक की तैयारी और अन्य व्यवस्थाओं पर नजर रखी गई। दरगाह के मुजाविर और स्थानीय सहयोगी भी पूरे आयोजन में अपनी जिम्मेदारियों में लगे रहे। काको टीम ने भी व्यवस्थाओं और आयोजन से जुड़े कार्यों में सहयोग किया। स्थानीय स्तर पर लोगों की यह भागीदारी काको के उर्स को केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहने देती, बल्कि इसे सामुदायिक सहभागिता का स्वरूप भी देती है। उर्स के पहले दिन असर के बाद जायरीनों के बीच मिट्टी के बर्तनों में गुड़ की खीर तक़सीम की गई। आपके आयोजन विवरण के अनुसार यह इंतज़ाम दरगाह इंतज़ामिया की ओर से किया गया, जिसमें जनाब सैय्यद सदरुद्दीन साहब और इंतज़ामी टीम की भूमिका रही। मिट्टी के बर्तन में परोसी गई गुड़ की खीर उर्स की सादगी और पारंपरिक मेहमाननवाज़ी का हिस्सा बनी। जायरीन इसे तबर्रुक के तौर पर लेकर अपने साथ गए। काको की धार्मिक परंपराओं में ऐसे सामुदायिक भोजन और तबर्रुक का अपना सामाजिक महत्व है लोग साथ बैठते हैं, साथ खाते हैं और एक-दूसरे से जुड़ते हैं। 




काको में स्थित बीबी कमाल का मकबरा सरकारी पर्यटन स्रोतों में भी महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल के रूप में दर्ज है। जहानाबाद जिला प्रशासन के आधिकारिक विवरण में बीबी कमाल को महिला सूफी संत बताया गया है और उनके मकबरे को काको के प्रमुख स्थलों में शामिल किया गया है। सरकारी पर्यटन विवरण के अनुसार यहां मुस्लिम समुदाय के साथ अन्य धर्मों के लोग भी आते हैं। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर बीबी कमाल की दरगाह को काको की साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मेल-जोल से जोड़कर देखा जाता है। बीबी कमाल को स्थानीय सूफियाना परंपरा में सम्मान से याद किया जाता है और कई लोग उन्हें मोहब्बत से “हिन्द की राबिया बसरी” कहते हैं। हालांकि बीबी कमाल के जीवन, काल और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं के बारे में अलग-अलग स्रोतों में अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए उनके बारे में लिखते समय प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य, स्थानीय परंपरा और लोक-मान्यता के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। 





बीबी कमाल का आस्ताना काको की व्यापक सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। काको से जुड़े नैन कटोरी, सेहत कुआं और अन्य स्थानीय विरासत स्थलों के साथ अनेक लोक-मान्यताएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं। इन स्थलों का व्यवस्थित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण समय की जरूरत है। काको के पुराने दस्तावेज़, स्थानीय साहित्य, बुज़ुर्गों की मौखिक स्मृतियां और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं यदि एक जगह संकलित की जाएं तो आने वाली पीढ़ियों को अपने शहर का इतिहास समझने में मदद मिल सकती है। उर्स के बाद 25 सितंबर को काको में राज्य स्तरीय सूफ़ी महोत्सव का आयोजन किया जाना है। प्रशासन की ओर से इसके लिए कार्यक्रम स्थल और आसपास के क्षेत्रों में तैयारियां की गई हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पेयजल, अस्थायी शौचालय, साफ-सफाई, प्रकाश और अन्य मूलभूत व्यवस्थाओं पर भी ध्यान दिया गया है। कार्यक्रम में निज़ामी ब्रदर्स की सूफ़ियाना और कव्वाली प्रस्तुति प्रस्तावित है। बीबी कमाल की दरगाह से जुड़ी विरासत को सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पर्यटन के माध्यम से व्यापक स्तर पर सामने लाने का यह प्रयास काको की पहचान को बिहार के बाहर तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। लेकिन उर्स की आज की मुख्य तस्वीर क्या है? आज की सबसे बड़ी खबर यही है कि काको में बीबी कमाल का उर्स शुरू हो चुका है। फज्र के बाद कुरआनख़्वानी हुई। फातिहा पढ़ी गई। आस्ताने पर अकीदतमंद पहुंचे। दरगाह निगरानी कमेटी और इंतज़ामिया व्यवस्थाओं में जुटी रही। काको टीम ने सहयोग किया। और पूरे दिन काको की फिज़ा में उर्स की रूहानी रंगत दिखाई देती रही। यही आज की खबर का केंद्र है। बाकी सारी बातें इसी विरासत को समझने की अगली कड़ी हैं। काको की विरासत को दर्ज करना भी जरूरी मेरे लिए काको की रिपोर्टिंग केवल किसी आयोजन की सूचना देना नहीं है। काको मेरी मिट्टी है। बीबी कमाल का आस्ताना काको की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए जरूरी है कि उर्स की खबर के साथ-साथ काको के इतिहास को भी दर्ज किया जाए। आज जो बुज़ुर्ग बातें जानते हैं, कल शायद वही बातें नई पीढ़ी तक न पहुंच पाएं। इसलिए स्कूलों में काको की विरासत पर परिचर्चाएं हों। स्थानीय इतिहास पर शोध हो। हिंदी और उर्दू में सामग्री तैयार हो। पुराने दस्तावेजों को सुरक्षित किया जाए। और काको में एक ऐसा रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी विकसित करने पर विचार हो, जहां बीबी कमाल और काको से जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री सुरक्षित रखी जा सके। क्योंकि किसी विरासत को मनाना जितना जरूरी है, उसे सहेजना और प्रमाणित रूप में दर्ज करना उससे भी जरूरी है। आज काको की फिज़ा में एक अलग ही रंग है 24 सितंबर की यह सुबह अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। कुरआनख़्वानी की आवाज़ें। फातिहा की दुआएं। आस्ताने पर पहुंचते जायरीन। दरगाह निगरानी कमेटी की सक्रियता। इंतज़ामिया की मेहनत।काको टीम का सहयोग। और पत्रकारों के कैमरे और कलम इन सबने मिलकर आज के उर्स की तस्वीर तैयार की। कल 25 सितंबर को सूफ़ी महोत्सव का मंच सजेगा।लेकिन आज की कहानी दरगाह की चौखट से शुरू हुई है।और आज की इस कहानी का पहला वाक्य यही है काको में बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा का दो दिवसीय उर्स-ए-पाक कुरआनख़्वानी और फातिहा के साथ शुरू हो गया है। आगे की कहानी महोत्सव बताएगा। लेकिन आज की कहानी अकीदत, परंपरा और काको की अपनी रूहानी पहचान की कहानी है।

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