सैय्यद आसिफ़ इमाम काकवी
चार चौदह में बसा है काको,
जिसकी अमर कहानी है,
पूरब विष्णु, पश्चिम दरगाह,
गंगा-जमुनी तहज़ीब पुरानी है।
काको, जहानाबाद | 25 सितंबर 2026 : कुछ जगहें सिर्फ़ नक़्शे पर मौजूद नहीं होतीं, बल्कि लोगों के दिलों में आबाद होती हैं। कुछ बस्तियाँ सिर्फ़ ईंट-पत्थर, गलियों, बाज़ारों और मकानों का नाम नहीं होतीं, बल्कि उनके सीने में सदियों की तारीख़, तहज़ीब, अकीदत, मोहब्बत, इंसानियत और रूहानियत साँस लेती है। काको भी ऐसी ही एक सरज़मीं है।
काको को अगर सिर्फ़ जहानाबाद का एक प्रखंड या एक क़स्बा समझ लिया जाए, तो शायद काको की असली पहचान हमारी निगाहों से ओझल हो जाए। काको को समझने के लिए इसकी मिट्टी को महसूस करना होगा, इसकी गलियों से गुज़रना होगा, इसके बुज़ुर्गों की बातें सुननी होंगी और सबसे बढ़कर मख़दूमा सय्यदा हज़रत बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा के उस आस्ताने पर सिर झुकाना होगा, जिसने सदियों से न जाने कितने दिलों को सुकून दिया है।
और आज की यह शाम मेरे लिए सिर्फ़ एक सूफ़ी महोत्सव की शाम नहीं थी। यह मेरे लिए मेरी क़लम की एक यादगार शाम थी। काको की सूफ़ी विरासत के लिए मेरी कलम से उठी आवाज़ जब मंच से स्थानीय विधायक ऋतुराज जी की आवाज़ बनी, तो लगा कि काको के दिल की बात ज़ुबान पा गई। सूफ़ी महोत्सव सिर्फ़ एक शाम नहीं, हमारी विरासत का सवाल है। मेरे सवालों को मंच से लब्बैक कहने और काको की विरासत के मुद्दे को उठाने के लिए विधायक जी का तहेदिल से शुक्रिया। यह मेरी नहीं, काको की अवाम की आवाज़ है।
क्योंकि आज मेरी तहरीर को आवाज़ मिली। वह अल्फ़ाज़ जो मैंने अपने दिल के दर्द से लिखे थे, आज काको की अवाम के बीच गूंज रहे थे। वह तारीख़ जिसे मैंने अपनी क़लम से बयान करने की कोशिश की, आज उसी काको की सरज़मीं पर लोगों को सुनाई गई। और उस लम्हे मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरी क़लम अब अकेली नहीं रही। काको ख़ुद मेरी तहरीर के साथ खड़ा हो गया है।
आज काको के आसमान पर बादल थे। बारिश कभी तेज़ होती और कभी हल्की फुहार में बदल जाती। रास्ते भीग रहे थे, गलियाँ पानी से तर थीं, लोग भीग रहे थे, मगर अकीदत के क़दम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। दरगाह हज़रत बीबी कमाल की तरफ़ बढ़ते रास्तों पर अकीदतमंदों का सिलसिला जारी था। किसी के हाथ में चादर थी। किसी के हाथ में फूल। किसी की ज़बान पर दरूद-ओ-सलाम था। किसी के दिल में अपनी मुराद थी। किसी की आँखों में दुआ थी। और किसी के दिल में सिर्फ़ इतना एहसास था कि आज वह बीबी कमाल के आस्ताने पर हाज़िर है। बारिश आसमान से बरस रही थी, मगर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अकीदत भी आसमान से ज़मीन पर उतर रही हो।
काको की इस रूहानी फ़िज़ा में आज एक अजीब कैफ़ियत थी।
दरगाह की तरफ़ बढ़ता हर क़दम जैसे कह रहा था यह सिर्फ़ रास्ता नहीं, अकीदत का रास्ता है। यह सिर्फ़ एक दरवाज़ा नहीं, उम्मीद का दरवाज़ा है।nयह सिर्फ़ एक मज़ार नहीं, सदियों की याद, दुआ और रूहानी निस्बत का मरकज़ है।
बीबी कमाल के आस्ताने पर चादरपोशी
सूफ़ी महोत्सव 2026 के मौक़े पर काको, जहानाबाद में मौजूद मख़दूमा सय्यदा हज़रत बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की तारीख़ी दरगाह पर ख़ास हाज़िरी और चादरपोशी हुई। माननीय मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, बिहार सरकार-सह-प्रभारी मंत्री, जहानाबाद श्री मोहम्मद जमा ख़ान ने आस्ताने पर हाज़िरी दी, इबादत की और चादर पेश की। यह मंज़र अपने अंदर एक अलग ही कैफ़ियत लिए हुए था। एक तरफ़ तारीख़ी आस्ताना, दूसरी तरफ़ अकीदतमंदों की मौजूदगी और दरमियान में दुआ के लिए उठे हुए हाथ। माननीय मंत्री के साथ जहानाबाद के विधायक श्री राहुल कुमार, मख़दुमपुर के विधायक श्री सूबेदार दास, ज़िला पदाधिकारी श्रीमती छिरिंग वाई भूटिया, पुलिस अधीक्षक श्री कोटा किरण कुमार, उप विकास आयुक्त, अपर समाहर्ता, अन्य प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि और दरगाह से जुड़े सम्मानित लोग भी मौजूद रहे। दरगाह पर हाज़िरी के इस रूहानी मंज़र ने एक बार फिर याद दिलाया कि बीबी कमाल का आस्ताना सिर्फ़ एक धार्मिक मक़ाम नहीं, बल्कि काको की तहज़ीबी और रूहानी पहचान का अहम हिस्सा है।
दरगाह पर चढ़ाई जाने वाली चादर को अगर सिर्फ़ एक रस्म समझ लिया जाए, तो शायद उसके अंदर छिपे जज़्बात को हम कभी महसूस नहीं कर पाएँगे। चादर अकीदत की ज़बान है। चादर मोहब्बत की ज़बान है। चादर दुआ की ज़बान है। चादर उस निस्बत का इज़हार है जिसे इंसान अपने दिल में लेकर किसी बुज़ुर्ग के आस्ताने तक पहुँचता है। काको में बीबी कमाल के आस्ताने पर नस्ल-दर-नस्ल अकीदत का यह सिलसिला जारी है। लोग दूर-दूर से आते हैं। कोई दुआ लेकर आता है। कोई उम्मीद लेकर आता है। कोई अपने बुज़ुर्गों की रवायत को आगे बढ़ाने आता है।nऔर कोई सिर्फ़ इस रूहानी माहौल में कुछ पल गुज़ारने के लिए आता है। लेकिन आस्ताने से लौटते हुए हर शख़्स के दिल में एक एहसास ज़रूर रह जाता है काको की मिट्टी में कुछ तो ऐसा है जो दिल को अपनी तरफ़ खींचता है।
दरगाह से महोत्सव के मैदान तक
दरगाह पर अकीदत और चादरपोशी के बाद सूफ़ी महोत्सव 2026 की शानदार तक़रीब का आग़ाज़ हुआ। काको की सूफ़ियाना सरज़मीं पर आयोजित यह महोत्सव मोहब्बत, अमन, रूहानियत और भाईचारे के पैग़ाम से सजा हुआ था। उद्घाटन समारोह में माननीय मंत्री श्री मोहम्मद जमा ख़ान, पूर्व सांसद श्री अरुण कुमार, जहानाबाद विधायक श्री राहुल कुमार, घोसी विधायक श्री ऋतुराज कुमार, मख़दुमपुर विधायक श्री सूबेदार दास, ज़िला पदाधिकारी श्रीमती छिरिंग वाई भूटिया, पुलिस अधीक्षक श्री कोटा किरण कुमार और अन्य जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। तमाम माननीय मेहमानों का पौधा और पेंटिंग पेश करके पुरख़ुलूस इस्तक़बाल किया गया। यह इस्तक़बाल भी अपने अंदर एक ख़ूबसूरत पैग़ाम रखता था। पौधा आने वाले कल की निशानी है। और पेंटिंग फ़न, तहज़ीब और याददाश्त की। यानी एक तरफ़ आने वाले कल की फ़िक्र और दूसरी तरफ़ अपने माज़ी की हिफ़ाज़त।
ज़िला पदाधिकारी का पैग़ाम
ज़िला पदाधिकारी श्रीमती छिरिंग वाई भूटिया ने अपने इस्तक़बालिया ख़िताब में तमाम मेहमानों का ख़ैरमक़दम करते हुए हज़रत बीबी कमाल की मोहब्बत, इंसानियत, शफ़क़त और रूहानी विरासत को याद किया। उन्होंने काको की सूफ़ी रवायत में मौजूद बाहमी हम-आहंगी, भाईचारे और सामाजिक एकजुटता के पैग़ाम को उजागर किया। यही वह पैग़ाम है जो काको की पहचान को एक अलग मायने देता है। काको की असली ताक़त उसकी इमारतों में नहीं। उसकी असली ताक़त उसके लोगों के दिलों में है। उसकी असली ख़ूबसूरती उसकी गलियों में नहीं। उसकी असली ख़ूबसूरती उस तहज़ीब में है जिसने मुख़्तलिफ़ लोगों को एक-दूसरे के क़रीब रहने का हुनर सिखाया।
सूफ़ी महोत्सव का असल मफ़हूम
सूफ़ी महोत्सव सिर्फ़ संगीत का कार्यक्रम नहीं। यह सिर्फ़ स्टेज, रोशनी और फ़नकारों का इज्तिमा नहीं। सूफ़ी महोत्सव के पीछे एक फ़िक्र है। एक पैग़ाम है। एक तहज़ीबी रवायत है। सूफ़ी रवायत हमेशा इंसान को इंसान से जोड़ने की बात करती है। मोहब्बत को नफ़रत पर तरजीह देने की बात करती है। अमन को फ़साद से बेहतर समझने की बात करती है। और इंसानियत को हर तक़सीम से बुलंद रखने का सबक़ देती है। इसीलिए बीबी कमाल की इस मुक़द्दस सरज़मीं पर होने वाला यह महोत्सव महज़ एक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं, बल्कि काको की रूहानी पहचान को सामने लाने का एक मौक़ा भी बन गया।
प्रभारी मंत्री का ख़िताब और मोहब्बत का पैग़ाम
माननीय प्रभारी मंत्री श्री मोहम्मद जमा ख़ान ने अपने ख़िताब में मौजूद लोगों को मुबारकबाद पेश की और सूफ़ी रवायत में छिपे मोहब्बत, अमन और भाईचारे के पैग़ाम पर रोशनी डाली। उन्होंने सूफ़ी संस्कृति की रूहानियत, इंसानियत के एहतराम और बाहमी हम-आहंगी की अहमियत को उजागर किया। बीबी कमाल की इस पाक सरज़मीं से जुड़े इस आयोजन में समाज को जोड़ने वाली सूफ़ियाना विरासत की अहमियत भी सामने आई। और यही तो काको की मिट्टी की सबसे ख़ूबसूरत ज़बान है दिल जोड़ो। दिल मत तोड़ो। मोहब्बत बाँटो। नफ़रत मिटाओ। इंसान को इंसान समझो।
जब काको की शाम सूफ़ियाना रंग में रंग गई
शाम ढलने लगी तो काको का मंज़र ही बदल गया। रोशनियों ने मैदान को जगमगा दिया। अवाम की बड़ी तादाद मौजूद थी। स्थानीय फ़नकारों ने अपनी दिलकश पेशकशों से माहौल में रंग भर दिया।
और फिर वह लम्हा आया जिसका लोगों को इंतज़ार था। सूफ़ियाना कलाम की आवाज़ बुलंद हुई। निज़ामी बंधुओं की रूहानी आवाज़ ने पूरे माहौल को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। लोग ख़ामोशी से सुन रहे थे। किसी के चेहरे पर ख़ुशी थी। किसी की आँखों में अकीदत।
किसी के दिल में कलाम की कैफ़ियत उतर रही थी। और ऐसा महसूस हो रहा था जैसे सूफ़ी महोत्सव का असल रंग अब पूरी तरह सामने आ गया हो। हर सुर में मोहब्बत का एहसास था। हर लफ़्ज़ में अमन की ख़ुशबू थी। हर पेशकश में रूहानियत की कैफ़ियत थी।
काको की अवाम को मिला इंतज़ार का लम्हा
जिन आवाज़ों को सुनने का इंतज़ार था, आज काको की अवाम को उन्हें रूबरू सुनने का मौक़ा मिला। यह सिर्फ़ एक फ़नकाराना पेशकश नहीं थी। यह काको की अवाम के लिए एक यादगार शाम थी। लोग एक ही मैदान में जमा थे। एक ही माहौल में थे। एक ही सूफ़ियाना कैफ़ियत में थे। और शायद यही सूफ़ी रवायत की ख़ूबसूरती है। यह इंसान को कुछ पलों के लिए उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से निकालकर ऐसे माहौल में ले आती है जहाँ दिल, ज़बान और रूह एक ही कैफ़ियत में आ जाते हैं।
अगर इस शाम का मंज़र एक तस्वीर में क़ैद किया जाए तो उस तस्वीर में बहुत कुछ होगा काको का आसमान। बादलों की ओट। बारिश की फुहार। मैदान में मौजूद अवाम। रोशनियों से सजा हुआ स्टेज।
सूफ़ियाना कलाम। निज़ामी बंधुओं की आवाज़। और हज़ारों दिलों में मोहब्बत, अमन और रूहानियत की कैफ़ियत। वही काको जिसकी गलियों में तारीख़ साँस लेती है। वही काको जहाँ एक तरफ़ क़दीम रूहानी रवायत है और दूसरी तरफ़ नई नस्ल अपने मुस्तक़बिल की तलाश में है। वही काको जिसके बारे में कहा जा सकता है यहाँ माज़ी सिर्फ़ किताबों में नहीं, माहौल में महसूस होता है।
काको की असली पहचान
काको की असली पहचान सिर्फ़ एक कार्यक्रम नहीं। काको की असली पहचान सिर्फ़ एक दरगाह नहीं। काको की असली पहचान सिर्फ़ एक तहज़ीबी महोत्सव नहीं। काको एक मुकम्मल दास्तान है।इस दास्तान में बीबी कमाल की रूहानी निस्बत है। इसमें सूफ़ी रवायत है। इसमें गंगा-जमुनी तहज़ीब है। इसमें तारीख़ी यादें हैं।
इसमें बुज़ुर्गों की दुआएँ हैं। इसमें नई नस्ल के ख़्वाब हैं। और इसमें एक ऐसी सामूहिक पहचान है जो आज भी लोगों को अपनी तरफ़ बुलाती है। इसीलिए काको के बारे में लिखना दरअसल सिर्फ़ एक शहर के बारे में लिखना नहीं। यह एक तहज़ीब के बारे में लिखना है।
आज बीबी कमाल की सरज़मीं से एक साफ़ पैग़ाम निकला दिलों में मोहब्बत हो। समाज में अमन हो। हर तरफ़ भाईचारा हो। इख़्तिलाफ़ हो तो तहज़ीब के साथ हो। और इंसानियत हर चीज़ से मुक़द्दम हो।
यह पैग़ाम सिर्फ़ काको के लिए नहीं। यह जहानाबाद के लिए भी है।
बिहार के लिए भी है। और उस पूरे मुल्क के लिए भी है जिसकी ताक़त उसकी मुख़्तलिफ़ तहज़ीबों, ज़बानों, रवायतों और बाहमी एहतराम में है।
एक महोत्सव ख़त्म होगा, मगर पैग़ाम बाक़ी रहेगा आज का कार्यक्रम ख़त्म हो जाएगा। रोशनियों की यह शाम गुज़र जाएगी। स्टेज ख़ाली हो जाएगा। आवाज़ें ख़ामोश हो जाएँगी। लोग अपने घरों को लौट जाएँगे। लेकिन अगर आज का पैग़ाम दिलों में रह गया, तो यह सूफ़ी महोत्सव अपनी असल मंज़िल तक पहुँच गया। क्योंकि सूफ़ी रवायत का असल हुस्न यही है कि महफ़िल ख़त्म हो जाती है, मगर उसका पैग़ाम ख़त्म नहीं होता। कलाम ख़त्म हो जाता है, मगर उसकी कैफ़ियत बाक़ी रहती है। चराग़ बुझ जाता है, मगर उसकी रोशनी दिल में रह जाती है। और आज काको की यह शाम भी शायद आने वाले कई बरसों तक लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेगी।
बीबी कमाल की सरज़मीं से दुआ
ऐ अल्लाह! बीबी कमाल की इस पाक सरज़मीं को हमेशा आबाद रख। काको की गलियों में मोहब्बत क़ायम रख। इसके लोगों में भाईचारा क़ायम रख। इसकी तारीख़ी विरासत की हिफ़ाज़त फ़रमा।
इसके बुज़ुर्गों की निस्बत को आने वाली नस्लों तक पहुँचाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। काको से अमन का पैग़ाम निकले।
जहानाबाद में ख़ुशहाली आए। बिहार तरक़्क़ी करे। और पूरे मुल्क में मोहब्बत, अमन, भाईचारे और इंसानियत का चराग़ रोशन रहे।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
आज काको की शाम ने फिर साबित किया काको सिर्फ़ एक जगह नहीं। काको एक एहसास है। काको एक तारीख़ है। काको एक रूहानी रवायत है। काको एक तहज़ीब है। और काको की सबसे बड़ी दौलत उसके वे लोग हैं जो अपनी इस पहचान से मोहब्बत करते हैं।
आज दरगाह पर चादर चढ़ी तो अकीदत ने सर झुकाया। सूफ़ी महोत्सव शुरू हुआ तो तहज़ीब ने सर उठाया। सूफ़ियाना कलाम गूँजा तो रूहानियत ने दिलों को छुआ। और जब अवाम ने इस पूरे मंज़र को अपनी आँखों से देखा तो काको की सदियों पुरानी दास्तान ने एक बार फिर ख़ुद को ज़िंदा महसूस किया। दरगाह पर अकीदत थी,मैदान में जश्न था,कलाम में रूहानियत थी, दिलों में मोहब्बत थी,और काको की मिट्टी में हमेशा की तरह एक ही पैग़ाम था मोहब्बत बाँटो, अमन क़ायम करो, इंसानियत को ज़िंदा रखो। यही बीबी कमाल की सरज़मीं का पैग़ाम है। यही काको की पहचान है। और यही सूफ़ी महोत्सव 2026 की सबसे ख़ूबसूरत याद है।










0 टिप्पणियाँ
if you have any doubts, please let me know.