काको उर्स की रूहानियत, सूफ़ी महोत्सव की चमक और काको की ज़मीनी तस्वीर के बीच कुछ सवाल?




सैय्यद आसिफ़ इमाम काकवी
Co-Founder — Bharat24 News Network


जहानाबाद : काको की मिट्टी आज फिर बोल रही है यह वही मिट्टी है जहाँ सदियों से दुआओं की खुशबू बसी है, जहाँ ख़ानक़ाहों की रूहानी रवायतें आज भी ज़िंदा हैं, जहाँ मंदिर की घंटियों और अज़ान की आवाज़ के बीच गंगा-जमुनी तहज़ीब ने अपनी खूबसूरत पहचान बनाई है और जहाँ मख़दूमा हज़रत बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा का आस्ताना आज भी दूर-दूर से आने वाले हजारों दिलों को अपनी तरफ़ खींचता है दो-दिवसीय उर्स-ए-मुबारक का पहला दिन अपनी रूहानी कैफ़ियत के साथ गुज़र चुका है। दूर-दराज़ से ज़ायरीन पहुँचे। फ़ातिहा हुई, दुआएँ हुईं, शीरनी बाँटी गई और आस्ताने की फ़िज़ा अकीदत और मोहब्बत से महकती रही। लेकिन इसी रूहानी माहौल के बीच आज काको एक सवाल पूछ रहा है क्या हम अपनी ही विरासत की मेहमान नवाज़ी का हक़ अदा कर पाए? मैं यह सवाल किसी शिकवे, शिकायत या व्यक्तिगत नाराज़गी के तौर पर नहीं लिख रहा हूँ। मैं काको की मिट्टी का बेटा हूँ। मैंने काको, बीबी कमालؒ और यहाँ की सूफ़ी विरासत पर वर्षों से लिखा है। मेरी क़लम ने काको की तारीख़, यहाँ की ख़ानक़ाहों, गंगा-जमुनी तहज़ीब और बीबी कमालؒ की रूहानी विरासत को अलग-अलग अख़बारों और मीडिया मंचों तक पहुँचाने की कोशिश की है। इसीलिए जब अपनी आँखों के सामने अपनी ही विरासत की कोई तस्वीर अधूरी दिखाई देती है, तो क़लम ख़ामोश नहीं रह पाती। उर्स और सूफ़ी महोत्सव दो अलग तस्वीरें क्यों? 25 सितम्बर को काको में सूफ़ी महोत्सव-2026 आयोजित हो रहा है। 






प्रशासन और पर्यटन विभाग की ओर से बड़े आयोजन की तैयारी है। मंच सजेगा, रोशनी होगी, मेहमान आएँगे, सूफ़ियाना कलाम की आवाज़ काको की फ़िज़ाओं में गूँजेगी और देश-दुनिया का ध्यान काको की तरफ़ जाएगा। यह अच्छी बात है। हम इसका स्वागत करते हैं।लेकिन मेरा सवाल यह है कि जिस आस्ताने की वजह से काको की पहचान सूफ़ी विरासत के रूप में सामने आ रही है, उसी आस्ताने पर उर्स के दौरान ज़ायरीन के लिए कुछ बुनियादी व्यवस्थाएँ आख़िरी वक़्त तक क्यों दिखाई दीं? कैमरे आख़िरी समय में लगाए जा रहे हैं। कुछ व्यवस्थाएँ अंतिम चरण में पूरी होती दिखाई दे रही हैं। आयोजन से ठीक पहले भागदौड़ नज़र आ रही है। तो सवाल स्वाभाविक है क्या तैयारियाँ कुछ पहले शुरू नहीं होनी चाहिए थीं? जनाब सैय्यद सदरुद्दीन साहब से अदब के साथ कुछ सीधे सवाल दरगाह-ए-मख़दूमा बीबी कमालؒ की इंतज़ामिया में जनाब सैय्यद सदरुद्दीन साहब की अहम ज़िम्मेदारी है। 





मैं उनका सम्मान करता हूँ। लेकिन सम्मान के साथ सवाल पूछना भी ज़रूरी है। जनाब सैय्यद सदरुद्दीन साहब, क्या इस बार सही वक़्त पर सही लोगों को साथ लेकर तैयारी शुरू नहीं की जा सकती थी? काको में ऐसे बहुत से लोग हैं जो वर्षों से दरगाह, उर्स और काको की विरासत से जुड़े हुए हैं। काको के पत्रकार हैं। लेखक हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हैं। युवा हैं। ख़ानक़ाहों से जुड़े लोग हैं। पुराने तजुर्बेकार लोग हैं। तो क्या इन सबको समय रहते एक साथ बैठाकर यह तय नहीं किया जा सकता था कि इस बार उर्स में आने वाले हर ज़ायिर को काको की मेहमाननवाज़ी का बेहतरीन एहसास कैसे कराया जाए? क्या एक बैठक कुछ महीने पहले नहीं हो सकती थी? क्या ज़िम्मेदारियाँ पहले नहीं बाँटी जा सकती थीं? क्या साफ़-सफ़ाई, वुज़ू, नमाज़, बैठने, पानी और ठहरने जैसी बुनियादी सुविधाओं की मुकम्मल योजना पहले नहीं बनाई जा सकती थी? और एक सवाल और, पूरी अदब के साथ क्या आप पहल करके काको और जहानाबाद के जिम्मेदार लोगों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और काको से मोहब्बत करने वालों को उर्स में आने की दावत नहीं दे सकते थे? क्या उन्हें साथ बैठाकर यह नहीं कहा जा सकता था आइए, बीबी कमालؒ के उर्स को हम सब मिलकर यादगार बनाते हैं। 





यह सवाल किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं है। यह सवाल इसलिए है क्योंकि बीबी कमालؒ का आस्ताना किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे काको की अमानत है। ज़ायरीन हमारे मेहमान हैं काको की पहचान सिर्फ़ मंच और रोशनी से नहीं है। काको की असली पहचान उसकी मेहमाननवाज़ी है। जो शख़्स सैकड़ों किलोमीटर दूर से बीबी कमालؒ के आस्ताने पर फ़ातिहा पढ़ने आया है, वह सिर्फ़ ज़ायिर नहीं हमारा मेहमान है। उसके लिए साफ़ रास्ता चाहिए।साफ़-सफ़ाई चाहिए। वुज़ू की जगह चाहिए। नमाज़ के लिए जगह चाहिए। बैठने की व्यवस्था चाहिए। पीने का पानी चाहिए। महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए सहूलियत चाहिए। और सबसे बढ़कर चाहिए काको का प्यार। जनाब सैय्यद सदरुद्दीन साहब, आप वर्षों से काको की दरगाह-ए-मख़दूमा बीबी कमालؒ से जुड़े हुए हैं और दरगाह के इंतज़ाम को क़रीब से देखते आ रहे हैं। इसलिए आपसे यह बात किसी शिकायत या इल्ज़ाम के तौर पर नहीं, बल्कि एक अपनेपन और दर्द के साथ कहना चाहता हूँ। जब भी ज़ायरीन बीबी कमालؒ के आस्ताने पर आते हैं, अक्सर कोई न कोई छोटी-बड़ी कमी या शिकायत सामने आ जाती है। अगर आम दिनों में भी ऐसी कमियाँ दिखाई देती हैं, तो उर्स जैसे बड़े मौक़े पर हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। कई वर्षों से उर्स आपकी निगरानी और इंतज़ामिया की ज़िम्मेदारी में होता आ रहा है। ऐसे में आने वाले मेहमानों की मेहमाननवाज़ी इन सबकी ज़िम्मेदारी आप पर हम सबकी तुलना में कहीं ज़्यादा बनती है। बीबी कमालؒ का आस्ताना हमारी पहचान है। 

यहाँ आने वाला हर ज़ायिर हमारा मेहमान है। उसकी छोटी-सी परेशानी भी हमारी अपनी कमी महसूस होनी चाहिए। प्रशासन से भी एक छोटी-सी गुज़ारिश मैं जिला प्रशासन की कोशिशों का सम्मान करता हूँ। सूफ़ी महोत्सव के ज़रिए काको की पहचान बिहार के पर्यटन मानचित्र पर सामने आ रही है यह काको के हर शख़्स के लिए खुशी की बात होनी चाहिए। लेकिन प्रशासन का ध्यान सिर्फ़ महोत्सव के मंच तक सीमित न रहे। काको का आस्ताना भी उसी तस्वीर का सबसे अहम हिस्सा है। महोत्सव की रोशनी के साथ उर्स की बुनियादी ज़रूरतों पर भी बराबर ध्यान होना चाहिएऔर स्थानीय इंतज़ामिया को भी केवल प्रशासन की तरफ़ देखने के बजाय अपनी ज़िम्मेदारी पूरी ताक़त से निभानी होगी। सरकार और प्रशासन अपनी जगह हैं लेकिन काको की अपनी ज़िम्मेदारी भी है। एक और सवाल है। क्या काको और जहानाबाद के सभी स्थानीय पत्रकारों, लेखकों और शोधकर्ताओं से समय पर संवाद हुआ? क्या उन लोगों को बुलाया गया जिन्होंने वर्षों से काको और बीबी कमालؒ पर लिखा? क्या उन कलमकारों से राय ली गई जिन्होंने काको की तारीख़ और सूफ़ी विरासत को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचाया? अगर किसी को निमंत्रण नहीं मिला तो इसे व्यक्तिगत शिकायत न समझा जाए। यह संवाद की कमी का सवाल है। काको की विरासत पर लिखने वाले लोग इस विरासत से अलग नहीं हैं। वे इसके दस्तावेज़कार हैं। उनकी क़लम ने काको को पहचान दिलाने में अपना हिस्सा निभाया है। उन्हें साथ लेकर चलना चाहिए। इंशाअल्लाह, मेरी सबसे बड़ी ख़्वाहिश यही है कि अगले साल 2027 जब बीबी कमालؒ का उर्स आए तो आख़िरी दिन की भागदौड़ न हो। कई महीने पहले तैयारी शुरू हो। स्थानीय लोगों की बैठक हो। जिम्मेदारियाँ पहले बाँटी जाएँ। दरगाह इंतज़ामिया, प्रशासन, पत्रकार, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा सब एक साथ बैठें। ज़ायरीन के लिए मुकम्मल इंतज़ाम हों। और काको पूरे बिहार से आने वाले हर मेहमान से कह सके आप काको आए हैं, आप हमारे मेहमान हैं।मेरी क़लम किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा रही। मेरी क़लम सिर्फ़ आईना दिखा रही है। क्योंकि मोहब्बत में सवाल भी होते हैं। और जो लोग अपनी मिट्टी से सच्ची मोहब्बत करते हैं, वे उसकी कमियों को छिपाते नहीं उन्हें सुधारने की कोशिश करते हैं। बीबी कमालؒ की चौखट पर उठे हर हाथ की दुआ काको के लिए है। आइए, हम सब मिलकर उस दुआ को अपनी ज़िम्मेदारी में बदलें। काको सिर्फ़ सूफ़ी महोत्सव का एक दिन नहीं काको सदियों की विरासत है। इस विरासत को सिर्फ़ मंच की रोशनी नहीं, बल्कि हमारी नीयत, हमारी ख़िदमत, हमारी मेहमाननवाज़ी और हमारी एकजुटता रोशन करेगी। दुआ है कि मख़दूमा बीबी कमालؒ की रहमत से काको में अमन, मोहब्बत, भाईचारा और इल्म की रोशनी हमेशा कायम रहे। काको की मिट्टी सलामत रहे। काको की रवायत सलामत रहे। काको की गंगा-जमुनी तहज़ीब सलामत रहे। और बीबी कमालؒ की विरासत आने वाली नस्लों तक महफ़ूज़ पहुँचे।

सैय्यद आसिफ़ इमाम काकवी
Co-Founder — Bharat24 News Network

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