काको की पुकार सूफ़ी महोत्सव सिर्फ़ आयोजन नहीं, विरासत बचाने का अवसर




  • काको की पुकार सूफ़ी महोत्सव सिर्फ़ आयोजन नहीं, विरासत बचाने का अवसर
  • बीबी कमाल की धरती को मंच से आगे पहचान और नई पीढ़ी से जोड़ने की जरूरत

सैयद आसिफ़ इमाम काकवी

काको… सिर्फ़ जहानाबाद का एक कस्बा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सूफ़ियाना परंपरा, गंगा-जमुनी तहज़ीब और साझा सांस्कृतिक विरासत की एक जीवंत पहचान है। इसी धरती पर मख़दूमा हज़रत बीबी कमालؒ की दरगाह आज भी लोगों के लिए आस्था, मोहब्बत और इंसानियत का संदेश देती है। इसी विरासत को सामने लाने के लिए सूफ़ी महोत्सव का आयोजन निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण अवसर है। लेकिन इस अवसर के साथ कुछ सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं और ये सवाल किसी व्यक्ति या संस्था के विरोध में नहीं, बल्कि काको की विरासत के प्रति हमारी जिम्मेदारी से जुड़े हैं। आखिर सूफ़ी महोत्सव में किन लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है और इसका आधार क्या है? क्या स्थानीय पत्रकारों, हिंदी-उर्दू अखबारों, डिजिटल पत्रकारों, ब्लॉगर्स और उन लोगों को भी इस आयोजन से जोड़ा जा रहा है, जिन्होंने वर्षों से काको की तारीख़, संस्कृति और बीबी कमालؒ की विरासत को अपनी कलम और कैमरे के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया है? काको और जहानाबाद के ऐसे अनेक लोग हैं जो बिना किसी सरकारी पद या मंच की अपेक्षा के लगातार इस क्षेत्र की पहचान को डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से सामने लाते रहे हैं। राजू इंक़लाबी, सैयद दानिश इमाम काकवी जैसे अनेक लोग काको की तारीख़ और संस्कृति पर लगातार सामग्री तैयार करते रहे हैं। क्या ऐसी स्थानीय कोशिशों को भी महोत्सव की व्यापक सोच में शामिल किया जा सकता है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सूफ़ी महोत्सव केवल एक दिन का सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। यह काको की सदियों पुरानी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। 





आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जहानाबाद के स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों को बीबी कमालؒ और काको की ऐतिहासिक एवं सूफ़ियाना विरासत के बारे में बताया जा रहा है? अगर हमारी नई पीढ़ी अपनी ही धरती का इतिहास नहीं जानेगी, तो आने वाले समय में इस विरासत को कौन याद रखेगा? जरूरत है कि स्कूलों में परिचर्चा हो, विद्यार्थियों को काको की ऐतिहासिक धरोहर से परिचित कराया जाए और शोधकर्ताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों तथा स्थानीय इतिहासकारों को जोड़कर इस विरासत का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए। काको में रिसर्च सेंटर, पुस्तकालय और विरासत दस्तावेजीकरण केंद्र जैसी स्थायी पहल पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए, ताकि सूफ़ी महोत्सव की रोशनी सिर्फ़ दो दिनों तक सीमित न रहे।






दावत-नामा नहीं मिला, लेकिन सवाल जरूर है पिछले दिनों बिहार के अलग-अलग हिस्सों से कई लोगों ने मुझसे संपर्क कर पूछा—“हम काको आना चाहते हैं, कार्यक्रम में कैसे शामिल हों? क्या बाहर से आने वालों के लिए कोई व्यवस्था है? मैं उन्हें क्या जवाब दूं? मैं, सैयद आसिफ़ इमाम काकवी, भारत24 न्यूज़ नेटवर्क और काको टीम के माध्यम से लगातार काको की आवाज़, उसकी तारीख़ और बीबी कमालؒ की विरासत को सामने रखने का प्रयास करता रहा हूं। लेकिन अब तक जिला प्रशासन की ओर से मुझे कोई औपचारिक आमंत्रण नहीं मिला। इसे मैं शिकायत के रूप में नहीं, बल्कि एक दर्द के रूप में देखता हूं। क्योंकि काको के लिए लिखना किसी व्यक्तिगत सम्मान या पद की अपेक्षा नहीं है। काको हमारा घर है। बीबी कमालؒ हमारी विरासत हैं। और यह विरासत आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। 

इसलिए बिहार सरकार के पर्यटन विभाग, जिला प्रशासन जहानाबाद, दरगाह प्रबंधन और तमाम आयोजकों से एक विनम्र अपील है कि इस महोत्सव को अधिक से अधिक लोगों से जोड़ने की कोशिश की जाए। स्थानीय पत्रकारों को जोड़िए। हिंदी-उर्दू के साहित्यकारों को जोड़िए। डिजिटल मीडिया और ब्लॉगर्स को जोड़िए। इतिहास और संस्कृति पर काम करने वाले शोधकर्ताओं को जोड़िए। और सबसे बढ़कर काको की नई पीढ़ी को जोड़िए। ताकि 24–25 सितंबर का आयोजन समाप्त होने के बाद भी काको की कहानी समाप्त न हो। काको की असली सफलता तब होगी, जब महोत्सव के बाद कोई बच्चा अपनी किताब में पढ़े कि उसकी अपनी धरती काको सिर्फ़ एक स्थान नहीं, बल्कि सूफ़ी परंपरा और साझा संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विरासत है। सूफ़ी महोत्सव की रोशनी मंच से निकलकर अगर स्कूलों, पुस्तकालयों, शोध केंद्रों और नई पीढ़ी के दिलों तक पहुंचे, तभी इसकी सार्थकता और बढ़ेगी। यह सवाल विरोध का नहीं, मोहब्बत का है। काको की मिट्टी से उठी यह आवाज़ बस इतना चाहती है काको को सिर्फ़ महोत्सव में मत खोजिए, काको की विरासत को आने वाली नस्लों में ज़िंदा रखिए। क्योंकि काको सिर्फ़ एक जगह नहीं, एक इतिहास है। एक तहज़ीब है। एक एहसास है। और एक साझा विरासत है।

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