क़ासिम ख़ुर्शीदؔ एक साल बाद भी यादों में रोशन है अदब का यह चिराग़




सैयद आसिफ़ इमाम काकवी 

आह…! क़ासिम ख़ुर्शीदؔ! आज आपको हमसे बिछड़े एक साल हो गया, मगर यक़ीन मानिए, दिल अब भी आपकी कमी महसूस करता है। आपकी शफ़क़त, आपकी मोहब्बत, आपकी मुस्कान, आपकी बेबाक मगर मोहब्बत भरी बातचीत और सबसे बढ़कर आपका हौसला देने वाला अंदाज़ आज भी ज़ेहन में उसी तरह मौजूद है, जैसे कल की बात हो। वक्त अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ गया, एक पूरा साल गुजर गया, मगर कुछ रिश्ते वक्त के साथ पुराने नहीं होते, बल्कि और गहरे होते जाते हैं। आपकी याद भी ऐसी ही एक याद है। 30 सितंबर 2025 की वह मनहूस सुबह आज भी याद आती है, जब यह खबर मिली कि काको, जहानाबाद की मिट्टी का यह रोशन सितारा, उर्दू और हिंदी अदब की दुनिया का जाना-पहचाना नाम, मशहूर शायर, अदीब, तर्जुमान, अफ़सानानिगार, नक़्क़ाद, मुबासिर और साहिब-ए-फ़िक्र शख़्सियत डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीदؔ इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए। ख़बर ऐसी थी जिसे दिल मानने को तैयार नहीं था। लगता था जैसे अभी फोन आएगा, अभी किसी महफ़िल में मुलाक़ात होगी, अभी उनकी वही प्यारी मुस्कान दिखाई देगी और अभी वह अपनी ख़ास शैली में कोई बात कहकर माहौल को खुशनुमा कर देंगे। लेकिन मौत बरहक़ है। 




इंसान आता है, अपनी मोहब्बत और अपने किरदार के निशान छोड़ता है और फिर अपने रब की ओर लौट जाता है। मगर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका जाना सिर्फ़ एक इंसान का जाना नहीं होता। उनके साथ एक दौर, एक आवाज़, एक सोच और एक अदबी माहौल भी ख़ामोश हो जाता है। डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीदؔ भी ऐसी ही शख़्सियत थे।

काको की सरज़मीन हमेशा से इल्म और अदब की ख़ुशबू से महकती रही है। इसी मिट्टी ने ऐसे लोगों को जन्म दिया जिन्होंने अपनी क़लम और अपनी सोच से बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान के अदबी नक़्शे पर अपनी पहचान बनाई। डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीदؔ इसी रिवायत के एक रोशन नाम थे। वह सिर्फ़ उर्दू के अदीब नहीं थे, बल्कि हिंदी अदब में भी उन्हें बराबर सम्मान और लोकप्रियता हासिल थी। उनकी सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उन्होंने भाषा को दीवार नहीं, बल्कि इंसानों और संस्कृतियों को जोड़ने वाला पुल समझा। उनकी शख़्सियत में इल्म की गहराई के साथ इंसानियत की गर्माहट भी थी। वह बड़े से बड़े अदबी मंच पर अपनी बात रखते थे, लेकिन सामने वाले को छोटा महसूस नहीं होने देते थे। 




नई पीढ़ी के लेखकों, छात्रों और साहित्य से जुड़े लोगों की हौसला-अफ़ज़ाई करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। वह शिकायतों में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि समाधान की बात करते थे। मुझे उनकी सकारात्मक सोच का एक प्रसंग विशेष रूप से याद आता है। पटना़ विश्वविद्यालय के फ़ारसी विभाग के एक रिफ्रेशर कोर्स में जब विद्यार्थियों के उर्दू से दूर होने की चर्चा चली, तो उन्होंने शिक्षकों को याद दिलाया कि आप विद्यार्थियों से शिकायत करने नहीं, बल्कि उनके रास्ते आसान करने के लिए शिक्षक बने हैं। उन्हें हौसला दीजिए, उनकी हौसला-शिकनी मत कीजिए। उनके ये शब्द आज भी शिक्षा और अदब से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक संदेश हैं। डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीदؔ साहित्यिक गतिविधियों के सक्रिय और लोकप्रिय चेहरे थे। मुशायरों और सेमिनारों में उनकी मौजूदगी महफ़िल को एक अलग रंग देती थी। उनकी बातचीत में ज्ञान भी था, अनुभव भी और अपनापन भी। उनकी मुस्कान और उनकी ज़िंदादिली उन्हें औरों से अलग बनाती थी। 





उर्दू नेट जापान से उनका विशेष लगाव था। वहाँ उनकी कोई रचना प्रकाशित होती तो वह उसे अपनी सोशल मीडिया टाइमलाइन पर बड़े उत्साह से साझा करते। इसी तरह ‘दरभंगा टाइम्स’ में प्रकाशित अपनी रचनाओं का भी वह गर्व से उल्लेख करते थे। यह उनके भीतर साहित्यिक संस्थानों और रचनाकारों के प्रति सम्मान को दर्शाता है। आज उन्हें गुज़रे एक साल हो गया है। मगर सवाल यह नहीं कि क़ासिम ख़ुर्शीदؔ हमारे बीच नहीं हैं; सवाल यह है कि उनकी छोड़ी हुई रोशनी को हम कितनी दूर तक ले जा पा रहे हैं। उनकी किताबें, उनकी रचनाएँ, उनकी यादें, उनके विचार और उनके चाहने वाले आज भी मौजूद हैं। यही किसी सच्चे साहित्यकार की असली विरासत होती है। कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी भी साहित्य की किसी कहानी की तरह है। कहानी चलती रहती है और अचानक ऐसा मोड़ आता है जहाँ पाठक स्तब्ध रह जाता है। क़ासिम ख़ुर्शीदؔ भी जैसे एक ऐसी ही कहानी का किरदार थे, जिनका अध्याय अचानक समाप्त हो गया, लेकिन कहानी का प्रभाव आज भी हमारे दिल और दिमाग़ में मौजूद है। क़ासिम साहब, एक साल गुजर गया मगर आपकी कमी कम नहीं हुई। आपकी शफ़क़त आज भी याद आती है, आपकी मोहब्बत आज भी महसूस होती है और आपकी आवाज़ आज भी जैसे अदबी महफ़िलों के बीच सुनाई देती है। आप जिस तरह लोगों के दिलों में जगह बनाकर गए, उसे वक्त मिटा नहीं सकता।

काको की मिट्टी का यह अदबी सितारा भले ही दुनिया से रुख़्सत हो गया हो, मगर उसकी रोशनी आने वाली नस्लों तक पहुँचती रहेगी। सूरज डूब सकता है, लेकिन उसकी रोशनी का असर तुरंत ख़त्म नहीं होता। शायद यही वजह है कि आज भी हम कहते हैं ख़ुर्शीद वक़्त से पहले ग़ुरूब तो हो गया, मगर उसकी रोशनी आज भी बाक़ी है। अल्लाह तआला डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीदؔ की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए। उनके परिवार, दोस्तों, शागिर्दों और तमाम चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।


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