महादलितों के हक और अंतिम व्यक्ति तक आरक्षण का सच लेखक: नीलेश कुमार,राष्ट्रीय सचिव, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर)




पटना : बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का सपना था कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक अवसर और न्याय पहुंचे। उन्होंने कहा था— "राष्ट्रपति का बेटा हो या भंगी संतान, सबको शिक्षा मिले एक समान।" लेकिन आजादी के 77 वर्षों बाद आज जब हम आरक्षण के प्रभाव का निष्पक्ष आकलन करते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। रोहिणी आयोग की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट उजागर किया था कि दलित और महादलित समाज को मिलने वाले कुल आरक्षण का लाभ महज 3% परिवारों/वर्गों के इर्द-गिर्द घूमता रह गया है, जबकि 97% महादलित आबादी आज भी अपने संवैधानिक हक और बुनियादी अवसरों से वंचित है।

इसी गंभीर असमानता को दूर करने के लिए हमारे नेता, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री संतोष कुमार मांझी जी और संरक्षक जीतन राम मांझी जी ने मजबूती से आवाज उठाई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मांग की है कि जिस महादलित समाज को अभी तक आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिला है, उनके लिए 'कोटा के भीतर कोटा' (Sub-classification/Sub-quota) की व्यवस्था लागू होनी चाहिए और इसकी व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए।

संतोष मांझी जी की यह मांग पूरी तरह न्यायसंगत और प्रासंगिक है। हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने भी अपने ऐतिहासिक फैसले में 'कोटा के भीतर कोटा' की व्यवस्था को संवैधानिक रूप से सही ठहराया है। अदालत का भी मानना है कि आरक्षण का उद्देश्य समाज के सबसे पिछड़े और वंचित तबके को मुख्यधारा में लाना है, न कि कुछ सीमित हाथों तक सिमट कर रह जाना।

सवाल उठता है कि जब 100% महादलितों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए समीक्षा और कोटा के भीतर कोटा की बात की जाती है, तो कुछ स्वघोषित दलित नेता इसका विरोध क्यों करने लगते हैं?

सच्चाई यही है कि जो नेता संतोष मांझी जी के इस विचार का विरोध कर रहे हैं, वे असल में संपूर्ण महादलित समाज के हितैषी नहीं हैं। वे केवल उसी 3% वर्ग के एकाधिकार को बचाए रखना चाहते हैं, जो दशकों से सारे अवसरों को समेटे बैठा है। बाकी 97% महादलितों को उनके अधिकारों से वंचित रखना और उन्हें आगे न आने देना ही असली सामंती मानसिकता है। जो इस व्यवस्था में बदलाव का विरोध करता है, सही मायने में वही आरक्षण का सबसे बड़ा विरोधी है।

बिहार में महादलित समाज की 18 अत्यंत वंचित और उपेक्षित जातियां—भुइयां/बुनिया, नट, डोम, मुसहर, चौपाल, मेस्तर/भंगी/वाल्मीकि, बस्तर, बाउरी, भोगता, दबगर, हलालखोर, हरि, कंचर, करिया, लालबेगी, तुरी, पान/स्वासी और अन्य उपेक्षित समूह—आज भी बुनियादी सुविधाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जब तक इन 18 जातियों के बच्चों को विशेष सुरक्षात्मक अवसर और कोटा के भीतर कोटा नहीं मिलेगा, तब तक सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी रहेगी।

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) महादलित समाज की इन सभी 18 उपेक्षित जातियों के अधिकारों की लड़ाई को अंतिम सांस तक लड़ेगा। हमारा स्पष्ट मानना है कि आरक्षण का लाभ हर महादलित के घर तक पहुँचे। श्री संतोष मांझी जी और श्री जीतन राम मांझी जी का यह कदम बाबा साहेब के विचारों को धरातल पर उतारने और अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी पहल है।

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