जनता से त्याग की उम्मीद, लेकिन सत्ता में बैठे लोग कब पेश करेंगे कुर्बानी की मिसाल?




सैयद आसिफ़ इमाम काकवी :
पटना : बिहार की राजनीति में इन दिनों मुफ्त बिजली को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आर्थिक रूप से संपन्न और आयकर देने वाले लोगों से अपील की है कि वे सरकार की ओर से मिलने वाली 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ स्वेच्छा से छोड़ दें, ताकि इस सुविधा का फायदा जरूरतमंद परिवारों तक पहुंच सके और राज्य के विकास में संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो। मुख्यमंत्री की इस अपील पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि संपन्न लोग समाज और राज्य के विकास में अपना योगदान दें। लेकिन सवाल यह है कि आखिर त्याग और कुर्बानी की शुरुआत हमेशा आम जनता से ही क्यों होती है? क्या बिहार के मंत्री, विधायक और सत्ता के गलियारों में बैठने वाले जनप्रतिनिधियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? अगर बिहार के विकास के लिए जनता से 125 यूनिट मुफ्त बिजली छोड़ने की अपील की जा सकती है, तो फिर मंत्री और विधायक भी आगे आएं और साल में छह महीने का अपना वेतन स्वेच्छा से छोड़कर बिहार के विकास कोष में जमा करें। कम से कम जनता को यह तो महसूस होगा कि त्याग का संदेश देने वाले लोग खुद भी मिसाल पेश कर रहे हैं। आखिर सवाल किसी की तनख्वाह का नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी और जनसेवा की भावना का है। चुनाव से पहले वादे, सत्ता मिलने के बाद अपील! बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को कौन भूल सकता है? चुनाव से पहले बिजली का मुद्दा जनता के बीच खूब चर्चा में था। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा किया था, तो एनडीए ने भी 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा की थी। जनता के सामने दोनों तरफ से राहत के वादे रखे गए। एनडीए की सरकार बनी और 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सुविधा लागू हुई। लेकिन अब जब मुख्यमंत्री संपन्न लोगों से इस सुविधा को छोड़ने की अपील कर रहे हैं, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या चुनाव से पहले सरकार ने इस योजना के खर्च का हिसाब नहीं लगाया था? क्या वादा करते समय आर्थिक बोझ का अंदाजा नहीं था? अगर था, तो आज जनता से त्याग की अपील क्यों? चुनाव के समय राहत का वादा और सत्ता में आने के बाद उसी राहत को छोड़ने की अपील—इस विरोधाभास पर सरकार को जनता के सामने साफ जवाब देना चाहिए।

शाम को महंगी बिजली, आखिर आम आदमी कहां जाए? बिहार के बिजली उपभोक्ताओं की परेशानी केवल मुफ्त बिजली तक सीमित नहीं है। टाइम ऑफ डे (ToD) टैरिफ के तहत सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक बिजली लगभग 20 प्रतिशत सस्ती और शाम 5 बजे से रात 11 बजे तक महंगी की गई है। अब जरा आम परिवार की जिंदगी को समझिए। सुबह बच्चे स्कूल जाते हैं, नौजवान कॉलेज और नौकरी पर निकलते हैं, मजदूर रोजी-रोटी कमाने घर से बाहर रहते हैं। दिन में घरों में बिजली की खपत अपेक्षाकृत कम रहती है। लेकिन शाम होते ही घरों में असली जरूरत शुरू होती है। बच्चे पढ़ाई करते हैं, महिलाएं रसोई में काम करती हैं, बुजुर्ग आराम करते हैं और नौकरी से लौटे लोग दिनभर की थकान मिटाते हैं। गर्मी के मौसम में पंखे, कूलर और एसी की जरूरत भी इसी समय सबसे ज्यादा होती है। ऐसे वक्त बिजली महंगी कर देने से आम उपभोक्ता पर अतिरिक्त बोझ पड़ना स्वाभाविक है। सवाल है कि जिस समय परिवार को बिजली की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसी समय उसे महंगी बिजली क्यों मिले? पटना, गया और दरभंगा समेत कई जिलों में भारत24 न्यूज़ नेटवर्क की ओर से लोगों की राय जानने पर उपभोक्ताओं ने इस व्यवस्था पर नाराजगी जताई। लोगों का कहना है कि दिन में सस्ती बिजली का लाभ हर परिवार नहीं उठा सकता, क्योंकि असली जरूरत तो शाम को होती है। जनता से पहले सत्ता अपने खर्च पर भी विचार करे! मुख्यमंत्री जी, बिहार की जनता भी इस राज्य की तरक्की चाहती है। कोई नहीं चाहता कि सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़े। लेकिन जनता यह भी देखना चाहती है कि सरकार खुद कितनी जिम्मेदारी निभाती है। मंत्री और विधायक अगर छह महीने का वेतन स्वेच्छा से छोड़ने की पहल करें, सरकारी सुविधाओं और अनावश्यक खर्चों में कटौती करें, तो यह जनता के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा। आखिर जनप्रतिनिधि जनता की सेवा के लिए चुने जाते हैं, केवल सुविधाएं हासिल करने के लिए नहीं। जनता के घर का बजट बिगड़ता है तो उसका दर्द भी समझना चाहिए। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बिजली का बिल केवल एक कागज नहीं, बल्कि महीने भर की मेहनत की कमाई का हिस्सा है। बिहार को अपील नहीं, बेहतर व्यवस्था चाहिए!

सरकार को चाहिए कि बिजली की दरों, स्मार्ट मीटर, पीक आवर्स में बढ़ते खर्च और उपभोक्ताओं की शिकायतों पर गंभीरता से विचार करे। बिजली व्यवस्था में पारदर्शिता लाए और यह सुनिश्चित करे कि गरीब तथा जरूरतमंद परिवारों को राहत मिलती रहे। संपन्न लोग स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ना चाहें तो उनका स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसे किसी नैतिक दबाव का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।

मेरी बात किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि बिहार के आम आदमी के हक में है। चुनाव के समय जनता से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। जनता उन वादों पर भरोसा करती है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने वादों को निभाए और हर फैसले का जवाब जनता के सामने रखे। आखिर में मुख्यमंत्री जी से बस इतना कहना है कि जनता से त्याग मांगने से पहले सत्ता में बैठे लोग भी त्याग का उदाहरण पेश करें। पहले मंत्री और विधायक अपनी छह महीने की तनख्वाह छोड़ने की पहल करें, फिर जनता से 125 यूनिट मुफ्त बिजली छोड़ने की अपील करें। क्योंकि बिहार की जनता केवल वोट देने के लिए नहीं है, वह इस राज्य की असली ताकत है। उसके घर में रोशनी रहे, उसके बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो और उसकी मेहनत की कमाई पर अनावश्यक बोझ न पड़े यही किसी भी जनकल्याणकारी सरकार की असली पहचान होनी चाहिए। जनता से कुर्बानी मांगना आसान है, लेकिन जनता के लिए अपनी सुविधाओं का त्याग करके दिखाना ही असली जनसेवा है।

— सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
सह-संस्थापक — भारत24 न्यूज़ नेटवर्क

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