लेखक: सैयद आसिफ़ इमाम काकवी :
“हयात ले के चलो, काएनात ले के चलो,
चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो।”
कुछ अशआर महज़ पढ़े नहीं जाते, बल्कि दिलों में उतरकर ज़िंदगी का फलसफ़ा बन जाते हैं। कुछ अल्फ़ाज़ वक़्त की सरहदों को पार कर इंसानियत की आवाज़ बनते हैं, तो कुछ महफ़िलें ऐसी होती हैं, जो लोगों को सिर्फ़ एक जगह जमा नहीं करतीं, बल्कि दिलों को दिलों से जोड़ देती हैं। उर्दू अदब की इसी रौशनी, शायरी की इसी मिठास और मोहब्बत की इसी ख़ुशबू का नाम है ज़श्न-ए-उर्दू, जो दस साल का यादगार सफ़र मुकम्मल करके 24 अक्टूबर 2026 को दुबई की सरज़मीन पर अपनी दसवीं सालाना अदबी महफ़िल सजाने जा रहा है।
दस साल! सुनने में यह महज़ एक गिनती लग सकती है, मगर किसी अदबी तहरीक को लगातार दस वर्षों तक ज़िंदा रखना, परदेस की सरज़मीन पर उर्दू की शमा को रौशन रखना और उर्दू-हिंदी के चाहने वालों को एक मंच पर इकट्ठा करना कोई मामूली काम नहीं। इसके पीछे बेपनाह मेहनत, ख़ुलूस, लगन, सब्र और अपनी ज़बान व तहज़ीब से बेपनाह मोहब्बत की ज़रूरत होती है। ज़श्न-ए-उर्दू का यह दस साला सफ़र उन्हीं जज़्बात की दास्तान है, जिसमें लफ़्ज़ों ने रिश्ते बनाए, शायरी ने दिलों को छुआ और अदब ने इंसानियत का पैग़ाम आम किया।
दुबई की सरज़मीन पर उर्दू की महक
दुबई दुनिया के उन शहरों में शामिल है, जहाँ मुख़्तलिफ़ मुल्कों, ज़बानों, तहज़ीबों और ख़यालात के लोग एक साथ रहते हैं। यहाँ ज़िंदगी की रफ़्तार तेज़ है, रोज़गार की मसरूफ़ियतें हैं और हर इंसान अपने ख़्वाबों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगा रहता है। ऐसे माहौल में अपनी ज़बान, अपनी अदबी रवायतों और अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए वक़्त निकालना अपने आप में एक ख़ूबसूरत जज़्बा है।
ज़श्न-ए-उर्दू ने इसी जज़्बे को एक मुकम्मल पहचान देने की कोशिश की है। यह मंच सिर्फ़ मुशायरे और कवि सम्मेलन का नाम नहीं, बल्कि उस तहज़ीबी रिश्ते की अलामत है, जो उर्दू और हिंदी को एक-दूसरे के क़रीब लाता है। यहाँ शेर भी पढ़े जाते हैं, कविताएँ भी सुनाई जाती हैं, यादें भी ताज़ा होती हैं और नई नस्ल को अपनी ज़बान की मिठास से रूबरू होने का मौक़ा भी मिलता है।
सैयद फ़रहान वास्ती: एक ख़्वाब से दस साल के कारवाँ तक
इस अदबी सफ़र का ज़िक्र जनाब सैयद फ़रहान वास्ती साहब के नाम के बग़ैर मुकम्मल नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश से अपने सफ़र का आग़ाज़ करके दुबई में उर्दू अदब के लिए लगातार कोशिश करना और एक अदबी मंच को दस साल तक कामयाबी के साथ आगे बढ़ाना उनकी लगन और अदब से गहरी दिलचस्पी की मिसाल है।
मैं उन्हें अपना अज़ीज़ मानता हूँ। उनके इस सफ़र को देखते हुए दिल में यह एहसास पैदा होता है कि जब इंसान किसी काम को शोहरत या निजी फ़ायदे के बजाय मोहब्बत और नेक नीयती से करता है, तो धीरे-धीरे वही काम एक तहरीक बन जाता है। एक शख़्स का ख़्वाब सैकड़ों लोगों की ख़ुशी, सैकड़ों दिलों की उम्मीद और आने वाली नस्लों के लिए एक यादगार विरासत बन सकता है।
दस साल की यह कामयाबी सिर्फ़ एक आयोजक की कामयाबी नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की मेहनत का नतीजा है जिन्होंने इस सफ़र में अपना वक़्त, अपनी मोहब्बत और अपना तआवुन पेश किया। शोअरा, शायरात, कवियों, अदब-नवाज़ों, सरपरस्तों, ख़ैरख़्वाहों और श्रोताओं की शिरकत ने इस महफ़िल को एक परिवार की शक्ल दी है।
शोअरा और शायरात की महफ़िल: हर आवाज़ का अपना रंग
शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को शेख़ राशिद ऑडिटोरियम, द इंडियन हाई स्कूल, ओद मेहता, दुबई में सजने वाली इस महफ़िल में देश-विदेश के नामचीन शोअरा और कवि शिरकत करेंगे। हर शायर की अपनी सोच, अपना लहजा और अपने अल्फ़ाज़ की अलग दुनिया होती है। कोई इश्क़ की कैफ़ियत बयान करता है, कोई समाज की सच्चाई को सामने लाता है, कोई इंसानियत की बात करता है और कोई अपने शेरों से ज़िंदगी के भूले हुए सबक़ याद दिलाता है।
इस महफ़िल की सदरियत की ज़िम्मेदारी अज़हर इनायती साहब निभाएँगे, जबकि नय्यर जलालपुरी साहब निज़ामत के फ़राइज़ अंजाम देंगे। इन दोनों अदबी नामों की मौजूदगी आयोजन को ख़ास अहमियत देती है।
इस यादगार शाम में शामिल होने वाले शोअरा और कवियों के नाम हैं:
1. इमरान प्रतापगढ़ी — अपने असरदार कलाम और सामाजिक सरोकारों के लिए पहचाने जाने वाले शायर।
2. अज़हर इनायती — सदर-ए-मुशायरा, जिनकी शायरी और अदबी शख़्सियत महफ़िल की रौनक़ होगी।
3. नय्यर जलालपुरी — निज़ामत-ए-मुशायरा से जुड़ा नाम, जो शायरों और सामईन के दरमियान अदबी राब्ते की अहम कड़ी है।
4. शकील आज़मी — अपने ख़ास शायराना अंदाज़ के लिए मशहूर नाम।
5. शमीम अब्बास — अदबी महफ़िल के शामिल शोअरा में से एक।
6. अहमद सलमान — इस दसवीं सालाना महफ़िल की शामिल शोअरा में से एक।
7. सलमा शाहीन — शायरात की मौजूदगी से महफ़िल में ख़वातीन की अदबी आवाज़ को भी जगह मिलेगी।
8. अबरार काशिफ़ — इस अदबी कारवाँ का हिस्सा बनने वाले शायर।
9. रहमान मुसव्विर — अपने नाम के साथ इस महफ़िल की शामिल शोअरा में से एक।
10. तबरेज़ मुनव्वर राना — इस यादगार अदबी आयोजन में शामिल शोअरा में से एक।
11. मनीका दुबे — हिंदी कविता की आवाज़ को इस साझी अदबी महफ़िल से जोड़ने वाला नाम।
12. सतलज राहत इंदौरी — इस अदबी शाम में शामिल शोअरा में से एक।
13. हिमांशी बबरा — इस अदबी शाम में शामिल शायरात और कवियों की शोअरा का हिस्सा।
14. उस्मान मिनाई — इस दसवें सालाना मुशायरे के आमंत्रित शोअरा में शामिल।
15. अख़्तर कानपुरी — इस अदबी महफ़िल की शोअरा में शामिल शायर।
इन तमाम नामों की मौजूदगी से उम्मीद है कि महफ़िल में ग़ज़ल, नज़्म, कविता, ख़याल और जज़्बात के कई रंग देखने-सुनने को मिलेंगे। हर आवाज़ अपनी जगह अहम है, क्योंकि अदब की असल ख़ूबसूरती किसी एक नाम या एक शोहरत में नहीं, बल्कि अलग-अलग आवाज़ों के मिलकर एक ख़ूबसूरत समा पैदा करने में है।
यादों के नाम सम्मान: अदब अपने बुज़ुर्गों को नहीं भूलता
इस आयोजन में मुनव्वर राना की याद से जुड़ा शान-ए-अवध अवॉर्ड और डॉ. राहत इंदौरी की याद से जुड़ा लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी ख़ास अहमियत रखते हैं। ये नाम उर्दू शायरी की उस दुनिया की याद दिलाते हैं, जहाँ अल्फ़ाज़ लोगों के दिलों में घर कर लेते हैं और शायर अपनी आवाज़ से अपने दौर की पहचान बन जाते हैं।
अदब की यह रवायत हमें सिखाती है कि किसी शख़्स की याद को ज़िंदा रखने का एक ख़ूबसूरत तरीक़ा उसके फ़न, उसके ख़याल और उसके अदबी योगदान का एहतराम करना भी है। जब नई नस्ल अपने बुज़ुर्गों के कलाम को सुनती और समझती है, तो वह केवल शायरी से परिचित नहीं होती, बल्कि अपने सांस्कृतिक इतिहास से भी रिश्ता जोड़ती है।
उर्दू और हिंदी: दो ज़बानें, साझी तहज़ीब की एक रौशनी
उर्दू की ख़ूबसूरती यह है कि वह अपने भीतर मोहब्बत, नरमी, शाइस्तगी और इंसानी रिश्तों की गहराई समेटे हुए है। हिंदी की अपनी मिठास, अपनी साहित्यिक परंपरा और अपनी व्यापक अभिव्यक्ति है। दोनों ज़बानों ने सदियों के दौरान एक-दूसरे से बहुत कुछ हासिल किया है। हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब इसी मेल-जोल की एक ख़ूबसूरत मिसाल है।
शायरी की महफ़िलों में जब उर्दू का शेर और हिंदी की कविता एक ही मंच से सुनाई देती है, तो यह दृश्य अपने आप में एक पैग़ाम बन जाता है। यह बताता है कि ज़बानें इंसानों को बाँटने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के क़रीब लाने के लिए होती हैं। लिपियाँ अलग हो सकती हैं, अल्फ़ाज़ का अंदाज़ अलग हो सकता है, मगर इंसानी जज़्बात की ज़मीन एक ही रहती है।
आज के दौर में जब नई नस्ल का एक बड़ा हिस्सा अपनी ज़बान और अदबी विरासत से दूर होता जा रहा है, ऐसे आयोजन और भी ज़रूरी हो जाते हैं। बच्चों और नौजवानों को शायरी से जोड़ना, उन्हें अच्छी किताबों की तरफ़ लाना और उन्हें अपनी तहज़ीब की ख़ूबसूरती समझाना किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।
यह जश्न सिर्फ़ दस साल का नहीं, आने वाले कल की उम्मीद का भी है
ज़श्न-ए-उर्दू के दस साल मुकम्मल होने पर सबसे बड़ी ख़ुशी इस बात की है कि यह सफ़र आगे बढ़ रहा है। किसी भी अदबी मंच की असल कामयाबी केवल भव्य आयोजन, बड़े नामों या तालियों की गूँज से तय नहीं होती। उसकी असल कामयाबी तब होती है जब वह नई नस्ल में पढ़ने का शौक़ पैदा करे, नौजवानों को लिखने की हिम्मत दे, शायरों को अपनी बात कहने का मौक़ा दे और समाज में मोहब्बत व इंसानियत की सोच को मज़बूत करे।
मेरी तमाम अदब-दोस्तों, उर्दू और हिंदी के पाठकों, शायरी के शौक़ीनों, नौजवानों और ख़ानदानों से दिली गुज़ारिश है कि इस अदबी जश्न का हिस्सा बनें। ऐसी महफ़िलों में शिरकत करना सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी ज़बान, अपने साहित्य और अपनी साझा विरासत के साथ रिश्ता मज़बूत करना भी है।
जनाब सैयद फ़रहान वास्ती साहब और उनकी पूरी टीम को ज़श्न-ए-उर्दू के दस साल मुकम्मल होने पर दिल की गहराइयों से मुबारकबाद। उन तमाम शोअरा, शायरात, कवियों, सरपरस्तों, अदब-नवाज़ों और चाहने वालों का भी शुक्रिया, जिनकी मोहब्बत और तआवुन ने इस कारवाँ को आगे बढ़ाया।
दुआ है कि यह महफ़िल आने वाले वर्षों में भी सजती रहे, नए शायर सामने आते रहें, किताबों से रिश्ते मज़बूत होते रहें और उर्दू-हिंदी की साझी विरासत नई नस्लों के दिलों में जगह बनाती रहे।
आख़िर में बस इतना ही:
लफ़्ज़ों में मोहब्बत हो, ख़यालों में उजाला हो,
हर दिल में इंसानियत, हर लब पर तराना हो।
ज़बानें चाहे अलग हों, मगर रिश्ता एक रहे,
अदब का यह कारवाँ हर दौर में जवाँ रहे।
मुलाक़ात का वक़्त और मक़ाम
- तारीख़: शनिवार, 24 अक्टूबर 2026
- वक़्त: रात 8 बजे
- मक़ाम: शेख़ राशिद ऑडिटोरियम, द इंडियन हाई स्कूल, ओद मेहता, दुबई, यूएई
ज़श्न-ए-उर्दू — दस साल, उर्दू अदब के नाम।
आइए, इस ऐतिहासिक सफ़र का हिस्सा बनें। लफ़्ज़ों की ख़ुशबू को महसूस करें, शायरी की मिठास का लुत्फ़ उठाएँ और मोहब्बत, इंसानियत तथा साझी तहज़ीब के इस पैग़ाम को आगे बढ़ाएँ।
मोहब्बतों का यह सफ़र जारी रहे, लफ़्ज़ महकते रहें, दिल जुड़ते रहें और अदब की रौशनी आने वाली नस्लों तक पहुँचती रहे।







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