दीबा फ़ातिमा के नाम एक शौहर का मोहब्बत भरा एतराफ़, एक ख़ूबसूरत परिवार की दास्तान और ज़िंदगी भर साथ निभाने का अहद
सैयद आसिफ़ इमाम काकवी :
न्यूज़ डेस्क। कुछ तारीख़ें महज़ कैलेंडर के पन्नों पर दर्ज अंक नहीं होतीं, बल्कि दिल की किताब में लिखी ऐसी यादें होती हैं, जिन पर वक़्त की गर्द कभी नहीं जमती। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसा ही दिन आया था 19 अक्टूबर 2007, जब दीबा फ़ातिमा मेरी हमसफ़र बनकर मेरे घर, मेरे दिल और मेरी तक़दीर का हिस्सा बनीं। आज 19 अक्टूबर 2026 को हमारी शादी के उन्नीस साल पूरे हो रहे हैं। उन्नीस साल का यह सफ़र जब दिल के आईने में देखता हूँ, तो महसूस होता है कि जैसे कल ही की बात हो। वही नए सपने, वही उम्मीदें, वही दुआओं से रोशन शुरुआत और एक-दूसरे का हाथ थामकर ज़िंदगी की अनजान राहों पर आगे बढ़ने का वह ख़ूबसूरत अहसास।
इन उन्नीस बरसों में कितने मौसम बदले, कितने हालात आए, कितनी ख़ुशियाँ हमारे आँगन में उतरीं और कितनी आज़माइशों ने हमारे सब्र का इम्तिहान लिया, मगर इन सबके बीच हमारा रिश्ता, हमारा भरोसा और एक-दूसरे के लिए दिल में मौजूद ख़ुलूस हमेशा अहम रहा। आज मैं सिर्फ़ अपनी शरीके-हयात के लिए कुछ अल्फ़ाज़ नहीं लिख रहा, बल्कि उस नेमत का एतराफ़ कर रहा हूँ जिसने मेरी ज़िंदगी में उम्मीद, सुकून और अपनाइयत के कई रंग भरे। दीबा फ़ातिमा! शायद ज़िंदगी की मसरूफ़ियत में मैं हमेशा अपने एहसासात का इज़हार न कर पाया होऊँ, शायद कई बार तुम्हारी मोहब्बत, तुम्हारे सब्र और तुम्हारी क़ुर्बानियों का शुक्रिया अदा करने में देर हुई हो, लेकिन 19 अक्टूबर 2007 की तारीख़ मेरे दिल पर हमेशा के लिए दर्ज है। यह वह दिन था जब अल्लाह तआला ने मुझे एक ऐसी हमसफ़र अता फ़रमाई, जो मेरी दोस्त, मेरी राज़दार, मेरी हमदर्द और मेरे जीवन के सफ़र की एक अहम साथी बनीं।
दुनिया में कामयाबी के बहुत से पैमाने हैं। कोई दौलत को कामयाबी समझता है, कोई शोहरत को और कोई बड़े ओहदे को, लेकिन वक़्त इंसान को सिखाता है कि ज़िंदगी की असल दौलत वे लोग हैं, जो मुश्किल वक़्त में उसका हाथ थामे रखते हैं, उसकी ख़ामोशी को समझते हैं और उसकी परेशानी को अपनी परेशानी समझते हैं। मेरे लिए तुम इसी दौलत का नाम हो। तुम्हारी मोहब्बत किसी दिखावे की मोहताज नहीं, तुम्हारी वफ़ा किसी तारीफ़ की तलबगार नहीं और तुम्हारी क़ुर्बानियाँ किसी इनाम की इंतज़ार में नहीं रहतीं। तुम्हारी सादगी, तुम्हारा सब्र, तुम्हारी दुआएँ और तुम्हारी मुस्कान मेरे लिए ऐसी नेमतें हैं, जिनकी क़ीमत दुनिया की बड़ी से बड़ी दौलत से नहीं आँकी जा सकती। घर सिर्फ़ दीवारों, दरवाज़ों और छत का नाम नहीं होता। घर वह एहसास है, जहाँ इंसान दुनिया भर की थकान लेकर लौटे तो उसे अपनाइयत मिले, जहाँ परेशानियों के बीच भी मोहब्बत का चिराग़ रोशन रहे और जहाँ बच्चों की हँसी ज़िंदगी की उदासी को कम कर दे। तुमने मेरे लिए घर को इसी ख़ूबसूरत एहसास का नाम दिया है। तुमने मुझे यह भी सिखाया कि रिश्तों को मज़बूत रखने के लिए सिर्फ़ ख़ुशी के लम्हे काफ़ी नहीं होते, बल्कि बर्दाश्त, समझदारी, दरगुज़र और एक-दूसरे की कमज़ोरियों को समझने का हौसला भी चाहिए।
मोहब्बत का मतलब हर बात पर इत्तिफ़ाक़ करना नहीं, बल्कि इख़्तिलाफ़ के बावजूद एक-दूसरे की इज़्ज़त करना है। ज़िंदगी में मुश्किलें आएँ तो एक-दूसरे के मुक़ाबिल खड़े होने के बजाय एक-दूसरे का सहारा बनना ही असल रफ़ाक़त है। इन उन्नीस सालों में हमने भी ज़िंदगी के कई रंग देखे हैं। रोज़गार की ज़िम्मेदारियाँ, विदेश में गुज़रे दिन, घर से दूर रहने की मजबूरियाँ और भविष्य की फ़िक्र—हर दौर ने कुछ न कुछ सिखाया। ऐसे में तुम्हारा भरोसा, तुम्हारा हौसला और तुम्हारी दुआएँ मेरे लिए बड़ी ताक़त बनीं। मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने हर ज़िम्मेदारी हमेशा बेहतरीन तरीक़े से निभाई या हर मौक़े पर अपने जज़्बात का इज़हार किया। मगर आज दिल से कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी मौजूदगी और तुम्हारा साथ मेरे लिए कितनी अहमियत रखता है। हमारी ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत कहानी का एक अहम बाब हमारे बच्चे, अदियान आसिफ़ इमाम और इज़ान इमाम हैं। उनकी मासूम हँसी, उनकी शरारतें, उनके सवाल और उनके सपने हमारे घर की रौनक हैं। उन्हें बड़ा होते देखकर एहसास होता है कि वक़्त कितनी तेज़ी से गुज़रता है। उनकी तालीम, उनकी तरबियत और उनके किरदार की तामीर हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। इस सफ़र में तुम्हारी ममता, तुम्हारा सब्र और तुम्हारी लगातार मेहनत हमारे बच्चों के लिए एक अनमोल सरमाया है।
माँ की मोहब्बत सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि हर दिन अपनी ख़ुशियों से पहले बच्चों की ख़ुशी को रखने का नाम है। मेरी दुआ है कि हमारे बच्चे तालीम और कामयाबी के साथ अच्छे अख़लाक़, इंसानियत, सच्चाई और बड़ों के एहतराम की दौलत भी हासिल करें। दीबा! तुमने सिर्फ़ मेरी शरीके-हयात का किरदार नहीं निभाया, बल्कि हमारे परिवार को मोहब्बत और समझदारी से जोड़े रखने में भी अहम हिस्सा अदा किया है। घर की बहुत-सी ज़िम्मेदारियाँ ऐसी होती हैं, जिनका ज़िक्र नहीं होता और जिनके लिए अक्सर शुक्रिया भी अदा नहीं किया जाता। आज मैं दिल से तुम्हारी उन तमाम कोशिशों, तुम्हारे सब्र और तुम्हारी मोहब्बत का एतराफ़ करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आने वाले सालों में तुम्हारी ख़ुशियों का और ज़्यादा ख़याल रखूँ, तुम्हारी बातों को बेहतर ढंग से समझूँ और तुम्हारे साथ अपने रिश्ते को हर दिन और मज़बूत बनाऊँ। क्योंकि मोहब्बत का असल इज़हार सिर्फ़ ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के बर्ताव, इज़्ज़त, तवज्जोह और एक-दूसरे के लिए वक़्त निकालने में होता है। आज उन्नीसवीं सालगिरह पर मैं अल्लाह तआला का शुक्र अदा करता हूँ कि उसने मुझे तुम्हारे जैसी हमसफ़र अता की। मेरी दुआ है कि अल्लाह हमारे रिश्ते में मोहब्बत, भरोसा और एहतराम हमेशा क़ायम रखे, हमारे घर को सुकून, आफ़ियत और रहमत से भर दे और हमारे बच्चों को नेक, कामयाब और हमारी आँखों की ठंडक बनाए। हमारे मरहूम बुज़ुर्गों की मग़फ़िरत फ़रमाए और हमें उनकी अच्छी यादों और तरबियत को ज़िंदा रखने की तौफ़ीक़ दे। ऐ मेरे रब! जिस रिश्ते को तूने 19 अक्टूबर 2007 को हमारे लिए एक नई ज़िंदगी की शुरुआत बनाया, उसे अपनी रहमत के साये में हमेशा सलामत रख। दीबा फ़ातिमा के चेहरे की मुस्कान क़ायम रख, उनके दिल को सुकून दे, उनकी सेहत और आफ़ियत में बरकत अता फ़रमा और मुझे यह तौफ़ीक़ दे कि मैं उनकी क़द्र सिर्फ़ ख़ास दिनों में नहीं, बल्कि ज़िंदगी के हर आम दिन में भी कर सकूँ।
आज उन्नीस साल पूरे होने पर मैं कोई बड़ा दावा नहीं करता, बस अपने दिल की एक सादी-सी हक़ीक़त बयान करना चाहता हूँ—दीबा फ़ातिमा! तुम मेरी ज़िंदगी के सफ़र की वह हमसफ़र हो, जिसकी रफ़ाक़त ने मेरे लिए घर, मोहब्बत और परिवार के मायने और भी ख़ूबसूरत बना दिए। मेरी ख़्वाहिश है कि ज़िंदगी के बाक़ी सफ़र में भी तुम्हारा हाथ इसी मोहब्बत और एहतराम के साथ थामे रखूँ। शादी की उन्नीसवीं सालगिरह मुबारक हो! अल्लाह करे हमारी यह रफ़ाक़त उम्र भर सलामत रहे और हर गुज़रते साल के साथ हमारी मोहब्बत, समझदारी, वफ़ा और शुक्रगुज़ारी और भी बढ़ती जाए आमीन।






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