सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
कभी-कभी तारीख़ सिर्फ़ किताबों के सफ़्हों पर नहीं लिखी जाती, बल्कि हमारी आँखों के सामने लिखी जाती है। कभी किसी पुरानी इमारत की एक ईंट गिरती है तो सिर्फ़ एक दीवार नहीं गिरती, बल्कि उसके साथ कई नस्लों की यादें, दुआएँ, सजदे और जज़्बात भी घायल हो जाते हैं। उज्जैन का मौजूदा मंज़र भी दिल को बेचैन कर देने वाला है।
शाही मस्जिद के एक हिस्से को सड़क चौड़ीकरण के सिलसिले में हटाए जाने के मामले ने शहर में तनाव पैदा किया। 28 सितंबर 2026 को पुलिस और प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच झड़पों की खबरें सामने आईं। पुलिस की ओर से आँसू गैस के इस्तेमाल और पथराव की खबरें भी सामने आईं। लेकिन मेरे लिए इस ख़बर का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि कितने फ़ीट हिस्सा हटेगा या सड़क कितनी चौड़ी होगी।
मेरे लिए असल सवाल यह है कि क्या तरक़्क़ी और विरासत के बीच कोई ऐसा रास्ता नहीं निकाला जा सकता, जिसमें सड़क भी बने, शहर भी आगे बढ़े और धार्मिक व ऐतिहासिक जज़्बात का सम्मान भी बाक़ी रहे? यह सवाल सिर्फ़ मुसलमानों का नहीं, हर संवेदनशील हिंदुस्तानी का सवाल है। मस्जिद मुसलमान के लिए महज़ ईंट, पत्थर और गारे की इमारत नहीं होती। मस्जिद वह जगह है जहाँ एक मज़दूर और एक अमीर एक ही सफ़ में खड़े होते हैं। जहाँ बादशाह और फ़क़ीर अपने रब के सामने बराबर हो जाते हैं। जहाँ अज़ान इंसान को दुनिया की भागदौड़ से निकालकर अपने ख़ालिक़ की तरफ़ बुलाती है।
अल्लाहु अकबर आओ नमाज़ की तरफ़ आओ फ़लाह की तरफ़। यह आवाज़ किसी के ख़िलाफ़ नहीं होती। यह किसी दूसरे मज़हब को नीचा दिखाने की आवाज़ नहीं होती। यह तो इंसान को अपने रब के सामने झुकने की दावत है। इस्लाम ने इल्म को इज़्ज़त दी, इंसाफ़ को अहमियत दी, पड़ोसी के हक़ बताए, कमज़ोर की मदद की तालीम दी और इंसानियत के साथ हुस्न-ए-सुलूक का पैग़ाम दिया। क़ुरआन करीम सिर्फ़ इबादत की किताब नहीं, बल्कि इंसान को ज़िंदगी जीने का रास्ता दिखाने वाली किताब है। उसमें इंसाफ़, रहम, अमानत, सच्चाई और इंसान के हक़ की तालीम मिलती है। इसीलिए मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ यह कहना चाहता हूँ हिंदू धर्म से नफ़रत करना यह इस्लाम नहीं कहता मस्जिद की दीवारें तोड़ो यह राम नहीं कहता। यही हिंदुस्तान की रूह है। हिंदुस्तान की खूबसूरती तो वह है जहाँ मस्जिद की अज़ान के साथ मंदिर की घंटियों की आवाज़ भी सुनाई देती है।
जहाँ किसी के घर ईद की ख़ुशी होती है तो पड़ोसी मिठाई लेकर पहुँचता है, और किसी के घर दीपावली का दिया जलता है तो मोहल्ले के लोग उसकी रोशनी में शरीक होते हैं। मज़हब हमें बाँटने के लिए नहीं, इंसान को बेहतर इंसान बनाने के लिए आया है।
यही वजह है कि हमें अपने बुज़ुर्गों की उस विरासत को याद करना चाहिए, जिसमें हिंदू और मुसलमान ने मिलकर इस मुल्क की मिट्टी को सींचा है। यह सरज़मीन सिर्फ़ किसी एक मज़हब, जाति या समुदाय की नहीं है। यह उन तमाम लोगों की है जिन्होंने इसकी मिट्टी से मोहब्बत की, इसकी आज़ादी के लिए कुर्बानी दी और इसके मुस्तक़बिल के लिए ख़्वाब देखे।
यह मुल्क चंद्रशेखर आज़ाद का भी है और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का भी। यह भगत सिंह का भी है और अब्दुल हमीद का भी। इन नामों के बीच कोई दीवार नहीं थी। इनके ख़ून का रंग अलग नहीं था। इनकी कुर्बानियों की क़ीमत अलग नहीं थी। फिर आज हम अपनी ही सरज़मीन पर एक-दूसरे के मज़हबी जज़्बात को क्यों घायल करें? तरक़्क़ी ज़रूरी है। सड़कें ज़रूरी हैं। शहर की बेहतर योजना ज़रूरी है।अवाम की सहूलियत ज़रूरी है।
लेकिन संवेदनशीलता भी ज़रूरी है। क़ानून भी ज़रूरी है। मुकालमा भी ज़रूरी है। और सबसे बढ़कर इंसानियत ज़रूरी है। उज्जैन के मामले में अदालत और प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई हुई है। मस्जिद के प्रभावित हिस्से को सड़क चौड़ीकरण से जोड़कर कानूनी प्रक्रिया चली और अलग-अलग चरणों में अदालत के सामने प्रशासन तथा संबंधित पक्षों की दलीलें रखी गईं। लेकिन अदालत और क़ानूनी दस्तावेज़ अपनी जगह हैं; लोगों के दिल में मौजूद दर्द अपनी जगह है। और यही वह मुक़ाम है जहाँ हुकूमत, प्रशासन, धार्मिक प्रतिनिधियों और अवाम सभी को असाधारण ज़िम्मेदारी का मुज़ाहिरा करना होगा। मैं पत्थरबाज़ी की हिमायत नहीं करता। मैं हिंसा की हिमायत नहीं करता। मैं किसी मज़हब के ख़िलाफ़ नफ़रत की हिमायत नहीं करता। क्योंकि अगर एक तरफ़ मस्जिद की हिफ़ाज़त के नाम पर पत्थर उठें और दूसरी तरफ़ क़ानून लागू करने के नाम पर जज़्बात को कुचला जाए, तो नुक़सान सिर्फ़ एक इमारत का नहीं होगा नुक़सान पूरे समाज के भरोसे का होगा।
उज्जैन की अवाम से मेरी दिली गुज़ारिश है अपनी आवाज़ बुलंद रखिए, मगर अमन के साथ। अपने हक़ की बात कीजिए, मगर क़ानून के दायरे में। अपनी मस्जिद से मोहब्बत कीजिए, मगर किसी दूसरे मज़हब से नफ़रत किए बिना। और प्रशासन से भी यही उम्मीद है कि हर क़दम क़ानून, पारदर्शिता, मानवीय संवेदनशीलता और बातचीत के रास्ते से उठाया जाए। क्योंकि सरकार की ताक़त सिर्फ़ इस बात में नहीं कि वह किसी जगह पुलिस खड़ी कर दे; असली ताक़त उस वक़्त दिखाई देती है जब वह लोगों के दिलों में भरोसा पैदा करे। मस्जिद का सम्मान मुसलमान के ईमान का हिस्सा है।
मंदिर का सम्मान इस मुल्क की तहज़ीबी रिवायत का हिस्सा है।और एक-दूसरे के धार्मिक जज़्बात का सम्मान भारतीय समाज की बुनियादी ज़रूरत है।हमें समझना होगा कि इबादतगाहें सिर्फ़ धार्मिक इमारतें नहीं होतीं, वे अपने-अपने समाज की सामूहिक याददाश्त भी होती हैं। किसी मस्जिद में बरसों के सजदे महफ़ूज़ होते हैं। किसी मंदिर में नस्लों की आस्था महफ़ूज़ होती है। किसी गुरुद्वारे में सेवा की रिवायत महफ़ूज़ होती है। किसी गिरजाघर में सदियों की दुआएँ महफ़ूज़ होती हैं। अगर हम हर इबादतगाह को सिर्फ़ एक निर्माण मानने लगेंगे तो हम इस मुल्क की रूह को समझने से महरूम हो जाएँगे। आज उज्जैन की गलियों से एक ऐसी आवाज़ उठनी चाहिए जो पूरे हिंदुस्तान तक पहुँचे हमें नफ़रत नहीं चाहिए। हमें फ़साद नहीं चाहिए।हमें मज़हबी जंग नहीं चाहिए।हमें इंसाफ़ चाहिए। हमें अमन चाहिए। हमें मुकालमा चाहिए।हमें अपनी साझी तहज़ीब की हिफ़ाज़त चाहिए। और आख़िर में बस इतना मस्जिद की अज़ान को ख़तरा समझने वाला हिंदुस्तान को नहीं समझता, और मंदिर की घंटी को दुश्मन की आवाज़ समझने वाला भी हिंदुस्तान को नहीं समझता। हिंदुस्तान तब तक हिंदुस्तान है, जब तक इसकी फ़िज़ाओं में मुख़्तलिफ़ आवाज़ें एक साथ सुनाई देती रहें। जब तक कहीं अज़ान बुलंद हो रही हो और कहीं मंदिर की घंटी बज रही हो। जब तक ईद की ख़ुशी में दीवाली की रोशनी शामिल हो और दीवाली की ख़ुशी में ईद की दुआ शामिल हो। जब तक एक हिंदुस्तानी दूसरे हिंदुस्तानी से यह न पूछे तुम्हारा मज़हब क्या है? बल्कि यह पूछे तुम्हें कोई तकलीफ़ तो नहीं? यही इंसानियत है। यही इस्लाम की इंसान-दोस्ती है। यही हिंदुस्तान की ख़ूबसूरती है। यही हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब है। और यही वह विरासत है जिसे हमें आने वाली नस्लों तक पहुँचाना है।
या अल्लाह! उज्जैन में अमन अता फ़रमा। मज़लूमों की हिफ़ाज़त फ़रमा। दिलों से ख़ौफ़ दूर फ़रमा। हर फ़ैसले में इंसाफ़, हिकमत और इंसानी हमदर्दी पैदा फ़रमा। और इस मुल्क को नफ़रत से नहीं, मोहब्बत से भर दे। आमीन या रब्बुल आलमीन।



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