जेडीयू की बैठक के बाद कई सवाल बाकी संजय झा ने क्या कहा? ललन सिंह क्यों नहीं दिखे? क्या शुरू हो गया है ‘निशांत उदय’ का दौर?




सैयद आसिफ़ इमाम काकवी

पटना: पटना में 18 सितंबर को जेडीयू के प्रदेश कार्यालय का कर्पूरी सभागार सिर्फ़ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का गवाह नहीं बना, बल्कि बिहार की सियासत के भविष्य को लेकर उठ रहे कई सवालों का केंद्र बन गया।आधिकारिक तौर पर इसे विधायकों और विधान पार्षदों के लिए एक दिवसीय प्रबोधन एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम बताया गया था। लेकिन जिस तरह बड़ी संख्या में जेडीयू के विधायक और वरिष्ठ नेता जुटे, जिस तरह नीतीश कुमार और उनके पुत्र निशांत कुमार पहली बार पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रम में एक साथ मंच पर दिखाई दिए और बैठक के दौरान निशांत को भविष्य के नेतृत्व से जोड़कर आवाज़ें उठीं, उसने राजनीतिक चर्चा को नई दिशा दे दी। सवाल अब सिर्फ़ यह नहीं है कि बैठक में क्या पढ़ाया गया। 




सवाल यह है कि जेडीयू की अगली कहानी लिखी कौन जा रहा है? बैठक के दौरान जेडीयू के कुछ नेताओं और विधायकों की ओर से निशांत कुमार को भविष्य के नेतृत्व से जोड़ने की बातें सामने आईं। मीडिया रिपोर्टों में विनय चौधरी और लेसी सिंह के बयानों का भी उल्लेख है, जिसमें निशांत की भविष्य की नेतृत्व भूमिका की पैरवी की गई। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब निशांत कुमार केवल नीतीश कुमार के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि जेडीयू के भीतर एक सक्रिय राजनीतिक चेहरे के रूप में दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, निशांत को मुख्यमंत्री बनाने का कोई आधिकारिक फैसला इस बैठक में नहीं हुआ है। इसलिए इसे अभी पार्टी का घोषित नेतृत्व परिवर्तन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनीति में कई बार फैसले घोषणा से पहले माहौल में दिखाई देने लगते हैं। और आज पटना के जेडीयू कार्यालय से निकलती तस्वीरों ने इसी माहौल को और चर्चा दे दी है। 





नीतीश और निशांत एक मंच पर तस्वीर ने क्या संदेश दिया? सबसे ज्यादा चर्चा उस तस्वीर की हुई जिसमें नीतीश कुमार और निशांत कुमार एक साथ पार्टी कार्यक्रम में नजर आए। 18 सितंबर का कार्यक्रम इस लिहाज से भी उल्लेखनीय रहा कि दोनों पहली बार किसी आधिकारिक जेडीयू कार्यक्रम में एक साथ मंच पर दिखाई दिए। नीतीश कुमार ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया और बाद में वहां से रवाना हो गए। पार्टी की ओर से यह बताया गया कि वे कार्यक्रम का उद्घाटन करने आए थे और अब ऐसे आयोजनों में ज्यादा देर रुकना उनका सामान्य तरीका है। इसके बाद कार्यक्रम की जिम्मेदारी पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने संभाली। संजय झा इस समय जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं और संगठन के कई महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका सामने आ रही है।





पार्टी के नाम को ‘जनता दल-नीतीश’ किए जाने का सुझाव भी उन्हीं की ओर से सामने आने की खबरें हैं। हालांकि इस पर अंतिम फैसला राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की प्रक्रिया से होना है। यानी एक तरफ पार्टी की पहचान को नीतीश कुमार के नाम से और मजबूत करने की चर्चा है, तो दूसरी तरफ उसी पार्टी में नीतीश के बाद की पीढ़ी के रूप में निशांत कुमार का नाम तेजी से उभर रहा है। क्या यह सिर्फ़ संयोग है? या फिर जेडीयू धीरे-धीरे अपने अगले दौर की राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है? इस सवाल का जवाब अभी पार्टी ने आधिकारिक तौर पर नहीं दिया है। बैठक में केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के वरिष्ठ नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह की गैरमौजूदगी भी चर्चा में रही। लेकिन यहां सावधानी जरूरी है।




ललन सिंह के बैठक में नहीं आने की कोई स्पष्ट आधिकारिक वजह मुझे उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में नहीं मिली है।इसलिए उनकी गैरमौजूदगी को नाराज़गी, गुटबाजी या किसी अंदरूनी टकराव का प्रमाण मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। खास बात यह है कि बैठक से कुछ दिन पहले ही ललन सिंह और अशोक चौधरी सहित वरिष्ठ नेताओं की नीतीश कुमार से मुलाकात की खबरें सामने आई थीं। इसलिए सवाल जरूर है ललन सिंह बैठक में क्यों नहीं थे? लेकिन उसका जवाब फिलहाल अटकलों से नहीं, आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही मिलना चाहिए। असली कहानी अभी बाकी है जेडीयू की आज की तस्वीर में कई परतें दिखाई देती हैं। एक तरफ नीतीश कुमार हैं। दूसरी तरफ संगठन की कमान संभालते संजय झा हैं। तीसरी तरफ तेजी से सक्रिय होते निशांत कुमार हैं। और चौथी तरफ पार्टी के पुराने एवं वरिष्ठ नेताओं की अपनी राजनीतिक भूमिका है। 




यही वजह है कि आज की बैठक को सिर्फ़ ‘प्रशिक्षण कार्यक्रम’ कहकर पूरी कहानी खत्म कर देना शायद इस घटनाक्रम की राजनीतिक चर्चा को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। फिर भी यह याद रखना जरूरी है कि राजनीतिक संकेत और आधिकारिक निर्णय दो अलग चीजें हैं। निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठना एक बात है और जेडीयू द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना दूसरी। आज पहली बात सामने आई है। दूसरी अभी नहीं। मेरे क़लम से आख़िरी सवाल बिहार की राजनीति में वंश, विरासत और नेतृत्व परिवर्तन कोई नया विषय नहीं है। लेकिन जेडीयू की आज की तस्वीर में पहली बार नीतीश और निशांत एक ही राजनीतिक मंच पर दिखाई दिए हैं। कार्यकर्ताओं की आवाज़ निशांत के नाम तक पहुंच रही है। संगठन नीतीश के नाम से अपनी पहचान जोड़ने की चर्चा कर रहा है। संजय झा संगठन की अगली रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। और पुराने दिग्गजों की मौजूदगी या गैरमौजूदगी पर सवाल उठ रहे हैं। तो फिर सवाल सिर्फ़ इतना नहीं कि निशांत कुमार कब मुख्यमंत्री बनेंगे? बड़ा सवाल यह है क्या जेडीयू ने नीतीश कुमार के बाद की राजनीति की पहली तस्वीर आज पटना के कर्पूरी सभागार में दिखा दी है, या यह सिर्फ़ एक राजनीतिक संयोग था? वक़्त इसका जवाब देगा लेकिन आज की तस्वीर ने सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया है।

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