गया… सिर्फ़ एक शहर नहीं, एक कहानी है





सैयद आसिफ़ इमाम काकवी

विशेष रिपोर्ट : गया इस नाम में सिर्फ़ एक शहर नहीं बसता। इस नाम में इतिहास है, तहज़ीब है, अदब है, आध्यात्मिकता है, मोहब्बत है और सदियों पुरानी ऐसी विरासत है, जिसने इस धरती को बिहार ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में एक अलग पहचान दी है। लेकिन मेरे लिए गया की कहानी कुछ और भी है। गया मेरा होम डिस्ट्रिक्ट है। इसी ज़िले की ऐतिहासिक धरती काको में मेरा जन्म हुआ। इसलिए गया मेरे लिए सिर्फ़ एक प्रशासनिक ज़िला नहीं, बल्कि मेरी पहचान, मेरी जड़ों और मेरी भावनाओं से जुड़ी हुई मिट्टी है।





आज जब वर्षों बाद गया की धरती पर कदम रखा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे समय ने कुछ पल के लिए करवट ली हो। पुरानी यादें सामने थीं और एक नया सवाल भी क्या गया की आवाज़ आज उसी मजबूती से देश तक पहुँच रही है, जिसकी यह ऐतिहासिक धरती हक़दार है? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए गया में कई बुज़ुर्गों, अदीबों, पत्रकारों और समाज के मोहज़्ज़ब लोगों से मुलाक़ात हुई। गया के बुज़ुर्ग अदीब एहसान तबिश से मुलाक़ात हुई। यह मुलाक़ात महज़ औपचारिक मुलाक़ात नहीं थी। गया के अदबी मिज़ाज, उसकी पुरानी रवायतों और बदलते दौर को लेकर विस्तार से बातचीत हुई बातों-बातों में यह महसूस हुआ कि गया की असली पहचान उसकी इमारतों और स्मारकों से कहीं आगे है। 




गया की असली पहचान उसके लोगों, उसकी ज़बान, उसके अदब और उसकी तहज़ीब में भी है। सीनियर जर्नलिस्ट शफ़ी अहमद से भी मुलाक़ात हुई। आज की पत्रकारिता किस दौर से गुजर रही है? डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता को किस तरह बदला है? नई पीढ़ी पत्रकारिता में क्या तलाश रही है? और ज़मीनी पत्रकारिता के सामने आज कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं? इन तमाम मुद्दों पर गंभीर बातचीत हुई। आज मीडिया के पास पहले से कहीं अधिक तकनीक है। मोबाइल फोन ही कैमरा भी है, स्टूडियो भी और प्रसारण का माध्यम भी। लेकिन तकनीक के इस दौर में एक सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है क्या ख़बर के पीछे मौजूद इंसान की आवाज़ भी उतनी ही मजबूती से सामने आ रही है? रिज़वी नय्यर साहब, आईएएस (सेवानिवृत्त) से मुलाक़ात हुई। उनके अनुभवों और दृष्टिकोण को सुनने का अवसर मिला। उनके भाई बुलंद इक़बाल से भी बातचीत हुई। इसके साथ ही यूसुफ़ शमशी, शबीह शमशी, सैयद फ़िरोज़ साहब, अजाज़ सुल्तान, टी.एम. ज़िया साहब, सादिक़ अख़्तर और अशफ़ाक़ अहमद साहब सहित कई सम्मानित और मोहज़्ज़ब लोगों से मुलाक़ात हुई। हर शख़्स की अपनी कहानी थी। हर व्यक्ति के पास गया को देखने का अपना नज़रिया था। लेकिन बातचीत के केंद्र में एक चीज़ बार-बार लौटकर आती रही गया और मगध की आवाज़ को और मजबूती से सामने लाने की ज़रूरत। मीडिया को लेकर गया क्या सोचता है? यह सवाल मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण था। आज गया का आम आदमी मीडिया से क्या चाहता है? क्या सिर्फ़ बड़ी घटनाएँ ख़बर बनें? या फिर उस छोटे दुकानदार की परेशानी भी ख़बर बने जो रोज़ अपनी दुकान खोलता है? क्या सिर्फ़ राजनीतिक बयान सुर्खियाँ बनें? या उस छात्र की मेहनत भी सामने आए जिसने सीमित संसाधनों में सफलता हासिल की? क्या सिर्फ़ शहर की बड़ी खबरें दिखाई जाएँ? या गया के गाँवों, मोहल्लों और कस्बों की समस्याओं को भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाए? इन्हीं सवालों पर बातचीत हुई। और यही वह जगह है जहाँ पत्रकारिता की असली ज़िम्मेदारी सामने आती है। 





आज की युवा पीढ़ी पत्रकारिता को सिर्फ़ अख़बार और टीवी के रूप में नहीं देखती। उसके हाथ में मोबाइल है। उसके सामने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म है। उसके पास अपनी बात कहने के अनेक माध्यम हैं। लेकिन इस बदलाव के साथ ज़िम्मेदारी भी बढ़ी है। नई पीढ़ी क्या चाहती है? वह किस तरह का मीडिया बनाना चाहती है? क्या वह सिर्फ़ तेज़ ख़बर चाहती है या सही ख़बर भी? क्या वह सिर्फ़ वायरल होना चाहती है या अपनी पत्रकारिता के ज़रिए समाज में सार्थक संवाद भी पैदा करना चाहती है? गया में हुई बातचीत में इन सवालों पर भी चर्चा हुई। इन्हीं मुलाक़ातों और बातचीत के बीच भारत 24 न्यूज़ नेटवर्क की गया से विशेष कवरेज की योजना ने एक नई दिशा ली है। बहुत जल्द गया और मगध से विशेष रिपोर्टों का सिलसिला शुरू करने का प्रयास किया जाएगा। इन रिपोर्टों में केवल ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं होगी। बल्कि कोशिश होगी कि सामने आए गया का इतिहास, गया का अदब, गया की संस्कृति, गया की शिक्षा, गया के युवा, गया की प्रतिभाएँ, गया के सामाजिक सवाल, गया के आम लोगों की समस्याएँ और गया की बदलती तस्वीर। 

हिंदी के साथ-साथ उर्दू मीडिया और उर्दू पत्रकारिता से जुड़े मुद्दों और आवाज़ों को भी स्थान देने का प्रयास रहेगा। क्योंकि गया की तहज़ीब बहुभाषी है और उसकी सांस्कृतिक विरासत भी अनेक धाराओं को अपने भीतर समेटे हुए है। गया से सिर्फ़ ख़बर नहीं एक संवाद शुरू होगा भारत 24 का उद्देश्य सिर्फ़ यह नहीं कि गया की खबर पटना या दिल्ली तक पहुँच जाए। कोशिश यह होगी कि गया की आवाज़ गया के लोगों से सुनी जाए। गया के पत्रकारों से बात हो। बुज़ुर्गों के अनुभव सामने आएँ। अदीबों की राय सामने आए। युवाओं के सपने सामने आएँ। बच्चों की प्रतिभाएँ सामने आएँ। और आम आदमी के सवालों को भी वही महत्व मिले जो किसी बड़ी ख़बर को मिलता है। आज गया की धरती पर खड़े होकर दिल में एक अजीब सी कैफ़ियत है। जैसे यह मिट्टी सवाल कर रही हो तुम इतने दिनों बाद क्यों लौटे?” और दिल के पास इसका कोई छोटा जवाब नहीं। ज़िंदगी इंसान को दूर ले जाती है। शहर बदलते हैं। देश बदलते हैं। काम बदलते हैं।लेकिन जड़ें नहीं बदलतीं।

मेरी जड़ें काको में हैं। मेरी पहचान गया से जुड़ी है। और मेरी यादों में इस पूरी धरती की मिट्टी बसी हुई है। इसलिए आज गया आना मेरे लिए महज़ एक पत्रकारिता दौरा नहीं था। यह अपनी मिट्टी से मुलाक़ात थी। अपने लोगों से मुलाक़ात थी। अपने अतीत से मुलाक़ात थी। और शायद आने वाले कल की एक नई शुरुआत भी। एक सवाल, जो गया से निकलकर पूरे मगध तक जाता है क्या हम अपने शहर की कहानियाँ खुद लिखेंगे? क्या हम अपनी नई पीढ़ी को अपनी बात कहने का मंच देंगे? क्या गया के गाँव, कस्बे और मोहल्ले भी मीडिया की मुख्यधारा में अपनी जगह बना पाएँगे? क्या हमारी पत्रकारिता सिर्फ़ घटना बताएगी या उसके पीछे छिपी इंसानी कहानी भी बताएगी? इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में ज़मीन पर तलाशना होगा। और शायद यही इस सफ़र की सबसे बड़ी वजह है। गया… तुम्हारी कहानी अभी बाकी है गया, तुम सिर्फ़ एक शहर नहीं हो। तुम मेरी मिट्टी हो।

तुम मेरी याद हो। तुम मेरी पहचान हो। तुम बुज़ुर्गों की दुआ हो। तुम अदीबों की महफ़िल हो।तुम नौजवानों के सपनों की ज़मीन हो। और तुम उन अनगिनत कहानियों की किताब हो, जिसके कई पन्ने अभी लिखे जाने बाकी हैं। मैं लौट आया हूँ…तुम्हारी कहानी सुनने के लिए। तुम्हारी आवाज़ समझने के लिए। तुम्हारे सवालों को देश तक पहुँचाने के लिए। और अपनी क़लम से यह कहने के लिए गया की कहानी गया से ही लिखी जाएगी।




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