मधुबनी - लदनियां से हरिश्चन्द्र यादव की रिपोर्ट
कोरोना की दूसरी लहर में प्रशासन की ओर से कोरोना संक्रमित लाश को घर ले जाने की इजाजत है। घर पहुंचे लाश की देखरेख में वहां प्राशासन व स्वास्थ्य महकमे के लोग नहीं होते हैं। फलतः परिजन लाश को श्मशानघाट की जगह घर ले जाते हैंं। परिवार के औरत व मर्द पैक्ड लाश को खोलकर देखते हैंं और यह भूल जाते हैं कि लाश कोरोना संक्रमित है। लाश को पैक करने से पहले मृतक के नाक में रूई तक नहीं डाली जाती है। ऐसे लाश को छूने व नजदीक से निहारने का परिणाम भयंकर हो सकता है। ऐसा अगर होता है, तो इस तरस लाश को सुपूर्द करना स्वास्थ्य विभाग की भूल साबित होगा। ऐसा गजहरा में तब देखा गया, जब ललित मंडल की लाश को उसके परिजन घर ले गये। लोग भूल गये कि यह कोरोना से मरा है। पैक को खोलकर लोगों ने मृतक को नजदीक से देखा। विधिवत सामान्य लाश की तरह बांस की अर्थी पर उठाकर शमशान घाट में जलाया गया।


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