23 सितंबर को पटना में भारत24 न्यूज़ नेटवर्क के कार्यालय से ख़ास क़व्वाली का लॉन्च, काको की रूहानी विरासत को सुरों में पेश करने की कोशिश




सैयद आसिफ़ इमाम काकवी

न्यूज़ डेस्क : काको सिर्फ़ एक नाम नहीं है। काको एक एहसास है, एक पहचान है, एक ऐसी सरज़मीं है जिसकी मिट्टी में इतिहास की खुशबू, तहज़ीब की रोशनी, इल्म की बरकत और सूफ़ियाना रूहानियत की कैफ़ियत आज भी महसूस की जा सकती है। यहां की गलियों से लेकर बुज़ुर्गों की दुआओं तक, मस्जिदों की अज़ान से लेकर दरगाह की चौखट तक, हर जगह एक ऐसा अपनापन है जो काको आने वाले हर शख़्स को अपनी तरफ़ खींचता है। इसी काको की रूहानी विरासत और हज़रत मख़दूमा सय्यदा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की अकीदत को अपनी आवाज़ में समेटते हुए जहानाबाद के मशहूर गायक शाहिद रफ़ी एक बार फिर एक ख़ास क़व्वाली लेकर सामने आए हैं। बीबी कमाल की चौखट” नाम से तैयार यह क़व्वाली सिर्फ़ संगीत की एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि काको की मिट्टी से जुड़ी मोहब्बत और बीबी कमाल की चौखट से जुड़ी अकीदत को आवाज़ देने की एक कोशिश है।

आज, 23 सितंबर, पटना स्थित भारत24 न्यूज़ नेटवर्क के कार्यालय में इस ख़ास क़व्वाली और वीडियो की लॉन्चिंग की गई। लॉन्चिंग के दौरान मौजूद लोगों ने प्रस्तुति को सराहा और शाहिद रफ़ी की आवाज़ में पेश किए गए इस सूफ़ियाना कलाम को पसंद किया। इस मौक़े पर मेरे दिल में एक अलग ही एहसास था। एक तरफ़ पटना जैसे बड़े शहर में इस प्रस्तुति का लॉन्च होना और दूसरी तरफ़ दिल में काको की वही पुरानी गलियां, वही मिट्टी और बीबी कमाल की वही चौखट ऐसा लगा जैसे काको की रूहानी आवाज़ पटना तक आ पहुंची हो।




मेरे लिए भारत24 न्यूज़ नेटवर्क के माध्यम से इस तरह की प्रस्तुति को सामने लाना सिर्फ़ एक मीडिया गतिविधि नहीं है। यह अपनी जड़ों, अपनी विरासत और अपने इतिहास से जुड़े एक भावनात्मक रिश्ते को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश है।जहानाबाद की सरज़मीं से अपनी पहचान बनाने वाले शाहिद रफ़ी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह बड़ी संख्या में गीतों और ग़ज़लों को अपनी आवाज़ में पेश कर चुके हैं। उनकी आवाज़ में एक अलग मिठास और ठहराव है, जो सुनने वाले को अपने साथ जोड़ लेता है। बीबी कमाल की शान में यह उनका पहला प्रयास नहीं है। इससे पहले भी शाहिद रफ़ी भाई ने बीबी कमाल की अकीदत में एक क़व्वाली पेश की थी, जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और सुना। अब एक बार फिर उन्होंने उसी मोहब्बत को आगे बढ़ाते हुए “बीबी कमाल की चौखट” पेश की है। इस क़व्वाली को सुनते हुए ऐसा महसूस होता है कि इसमें केवल सुर और संगीत नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की पुकार भी शामिल है। इसमें काको की गलियों की याद है, बुज़ुर्गों की दुआओं का असर है और बीबी कमाल की चौखट के प्रति अकीदत का जज़्बा है।

बीबी कमाल के उर्स के मौक़े पर इस तरह की प्रस्तुति का सामने आना अपने आप में एक भावनात्मक क्षण है। उर्स का मौक़ा उन तमाम अकीदतमंदों के लिए याद और दुआ का अवसर होता है, जो बीबी कमाल की चौखट से अपने दिल का रिश्ता महसूस करते हैं। काको की दरगाह शरीफ़ में दूर-दराज़ से ज़ायरीन आते हैं। कोई दुआ लेकर आता है, कोई शुक्राने के साथ आता है और कोई सिर्फ़ उस रूहानी फ़िज़ा में कुछ पल बिताने की चाहत लेकर पहुंचता है। यही काको की ख़ूबसूरती है यहां आने वाला इंसान अपने साथ जो भी पहचान लेकर आए, चौखट पर पहुंचकर उसके दिल में मोहब्बत और इंसानियत का एहसास सबसे ऊपर दिखाई देता है। काको की पहचान केवल उसकी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत से नहीं है। यहां की सबसे बड़ी ताक़त इसकी आपसी मोहब्बत और साझा संस्कृति भी है। बीबी कमाल की चौखट से जुड़ी यह क़व्वाली इसी साझा विरासत को सुरों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का एक माध्यम बन सकती है। संगीत की कोई सीमा नहीं होती। एक सच्ची आवाज़ दिल तक पहुंचती है और दिल से निकली मोहब्बत किसी एक मज़हब या समुदाय की नहीं होती। इसीलिए मेरी नज़र में “बीबी कमाल की चौखट” केवल एक क़व्वाली नहीं, बल्कि काको की मिट्टी को सलाम करने की एक कोशिश है। कौन-कौन जुड़े हैं इस प्रस्तुति से

🎙️ सिंगर: शाहिद रफ़ी
🎼 म्यूज़िक कंपोज़र: एहसान आलम
🎚️ रिकॉर्ड एवं मिक्स: राजेश राज (राजू जी), स्टूडियो प्रगति, पटना
🤝 सपोर्टेड बाय: सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
📰 विशेष प्रस्तुति: भारत24 न्यूज़ नेटवर्क

काको की टीम ने इस वीडियो को भी ख़ास अंदाज़ में तैयार किया है, ताकि क़व्वाली के साथ काको की रूहानी पहचान और बीबी कमाल की चौखट से जुड़ी भावनाओं को भी दर्शकों तक पहुंचाया जा सके। मैं अपने तमाम दोस्तों, काकोवासियों, जहानाबाद के लोगों और देश-विदेश में रहने वाले काको से जुड़े तमाम अकीदतमंदों से दिल की गहराइयों से अपील करता हूं कि इस क़व्वाली को ज़रूर सुनें।

सिर्फ़ एक गीत समझकर नहीं…
बल्कि अपनी मिट्टी की आवाज़ समझकर सुनिए। अगर आपको इसमें काको की याद आए, बीबी कमाल की चौखट की अकीदत महसूस हो और शाहिद रफ़ी की आवाज़ दिल को छू जाए, तो इसे दूसरों तक भी पहुंचाइए। क्योंकि विरासत सिर्फ़ किताबों में नहीं बचती। विरासत तब ज़िंदा रहती है, जब नई पीढ़ी उसे सुनती है, समझती है और आगे बढ़ाती है।




अल्लाह तआला हज़रत मख़दूमा सय्यदा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की चौखट को हमेशा अमन, मोहब्बत और रूहानी रोशनी का मरकज़ बनाए रखे। यहां आने वाले तमाम ज़ायरीन की जायज़ दुआओं को क़ुबूल फ़रमाए और काको की इस ख़ूबसूरत विरासत को आने वाली नस्लों तक सलामत पहुंचाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
आज पटना से यह आवाज़ उठी है, लेकिन इसकी जड़ें काको की उसी मिट्टी में हैं, जहां से मोहब्बत, अकीदत और सूफ़ियाना विरासत की यह कहानी सदियों से चलती आ रही है। बीबी कमाल की चौखट पर फिर गूंजेगी शाहिद रफ़ी की आवाज़ काको की मिट्टी फिर सुरों में बोलेगी और मोहब्बत का यह पैग़ाम फिर दिलों तक पहुंचेगा। ❤️

✍️ सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
“मेरे क़लम से”

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