देश की पुलिस हर बार इसलिए नाकाम रहती है। दंगाई का नंगा नाच होता रहता है और वह मूक-दर्शक बनी रहती है। वह इस प्रकार सुस्त और भ्रष्ट हो गई है, उनमें अपराध को रोकने का आत्मबल ही नहीं रह गया है। हर अपराध से अधिक से अधिक कमाई, मलाई और मिठाई खाने की उनकी बुनियादी वृत्ति हो गई। उसे बदलने की जरूरत है। न्यायालय में न्याय नहीं है। विश्वविद्यालय में ज्ञान नहीं है और अस्पताल में उपचार नहीं है। नतीजा है – देश और देशवासियों के स्वास्थ्य-सम्पत्ति सबकुछ असुरक्षित हैं। बदलाव का नारा हर वारदात के बाद आता है और वक्त के साथ वह ठंडे बस्ते में चला जाता है। क्योंकि बेहतर बदलाव नारों से नहीं, निष्ठा से आते हैं। देश में निष्ठावान नेता और प्रशासकों की बेहद कमी है। -डॉक्टर राजीव रंजन
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